अलवर जिला प्रमुख की कुर्सी पर किसका होगा कब्जा? दो दशक से कांग्रेस का दबदबा, भाजपा के सामने बोर्ड बनाने की चुनौती
अलवर जिला परिषद में जिला प्रमुख की कुर्सी को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला दिलचस्प हो गया है। पिछले करीब दो दशक से जिला प्रमुख पद पर कांग्रेस का दबदबा रहा है। अब भाजपा इस राजनीतिक परंपरा को बदलने की कोशिश में है। 22 अक्टूबर को पहले चरण में छह पंचायत समितियों के अंतर्गत 19 जिला परिषद सदस्यों और 112 पंचायत समिति सदस्यों के लिए मतदान हुआ। जिला परिषद की शेष 20 सीटों पर दूसरे चरण में मतदान होना है। चुनाव परिणाम के बाद जिला प्रमुख चुनने के लिए राजनीतिक रणनीति और समीकरण अहम होंगे।
जिला प्रमुख की कुर्सी पर भाजपा-कांग्रेस की नजर
अलवर में पंचायती राज चुनाव के पहले चरण का मतदान संपन्न होने के बाद जिला प्रमुख पद को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही जिला परिषद में अपना बोर्ड बनाने की कोशिश में जुटी हैं। कांग्रेस के सामने अपना पुराना राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने की चुनौती है। वहीं, भाजपा इस बार जिला प्रमुख की कुर्सी हासिल कर ग्रामीण राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है।जिला प्रमुख का चुनाव केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं रहता। निर्वाचित जिला परिषद सदस्यों का समर्थन और दलों की रणनीति भी महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में चुनाव परिणाम के साथ-साथ सदस्यों का समर्थन किस दल को मिलता है, इस पर भी नजर रहेगी।
पहले चरण में 19 जिला परिषद सीटों पर हुआ मतदान
22 अक्टूबर को पंचायती राज चुनाव के पहले चरण में अलवर जिले की छह पंचायत समितियों के अंतर्गत मतदान कराया गया। इस चरण में जिला परिषद की 19 सीटों और पंचायत समिति सदस्यों की 112 सीटों के लिए वोट डाले गए।जिला परिषद की कुल 39 सीटों में से शेष 20 सीटों पर दूसरे चरण में मतदान होना है। दोनों चरणों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जिला परिषद में राजनीतिक तस्वीर स्पष्ट होगी। इसके बाद जिला प्रमुख के चुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस की रणनीति और महत्वपूर्ण हो जाएगी।फिलहाल किसी भी दल की जीत को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। जिला प्रमुख पद पर कब्जा किसका होगा, इसका फैसला चुनाव परिणाम और उसके बाद बनने वाले समर्थन के समीकरणों से तय होगा।
अलवर की राजनीति में जिला प्रमुख पद का खास महत्व
अलवर जिला प्रमुख का पद ग्रामीण प्रशासन के साथ-साथ जिले की राजनीति में भी अहम माना जाता है। इस पद पर रहने वाले नेताओं को जिला स्तर पर राजनीतिक पहचान बनाने का अवसर मिलता है। पिछले वर्षों में जिला प्रमुख रहे कई नेताओं ने आगे चलकर विधानसभा की राजनीति में भी अपनी जगह बनाई।वर्ष 2005 में टीकाराम जूली जिला प्रमुख बने थे। उन्होंने इसी पद से अपनी राजनीतिक पारी को आगे बढ़ाया। वर्तमान में वे राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। उनका राजनीतिक सफर जिला प्रमुख पद की अहमियत को दर्शाता है।वर्ष 2010 में साफिया जुबेर खान जिला प्रमुख बनीं। बाद में उन्होंने रामगढ़ विधानसभा क्षेत्र से विधायक के रूप में भी प्रतिनिधित्व किया। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि जिला प्रमुख का पद कई नेताओं के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा है।
2015 में भाजपा बहुमत के बावजूद नहीं बना सकी थी बोर्ड
वर्ष 2015 का जिला परिषद चुनाव अलवर की राजनीति में खास चर्चा का विषय रहा था। उस समय भाजपा के पास बहुमत होने के बावजूद पार्टी अपना बोर्ड बनाने में सफल नहीं हो सकी। कांग्रेस की रेखा राजू यादव जिला प्रमुख बनीं।उस चुनाव के दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेताओं डॉ. जसवंत यादव और डॉ. रोहिताश शर्मा के बीच राजनीतिक मतभेदों की चर्चा रही थी। उस समय अंदरूनी खींचतान और क्रॉस वोटिंग को भाजपा की असफलता की वजह माना गया। हालांकि, इन परिस्थितियों के अलग-अलग राजनीतिक आकलन भी रहे।यह घटनाक्रम बताता है कि जिला परिषद में बहुमत होना महत्वपूर्ण है, लेकिन जिला प्रमुख के चुनाव में सदस्यों का समर्थन और दल के भीतर तालमेल भी निर्णायक हो सकता है। इस बार दोनों दल इसी पहलू को ध्यान में रखकर रणनीति बनाने की कोशिश करेंगे।
2021 में कांग्रेस की वापसी, बलबीर छिल्लर बने जिला प्रमुख
वर्ष 2021 के जिला परिषद चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर बढ़त हासिल की थी। बलबीर छिल्लर जिला प्रमुख बने। इससे जिला परिषद में कांग्रेस का राजनीतिक प्रभाव कायम रहा।हालांकि, बाद में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद लोकसभा चुनाव से पहले बलबीर छिल्लर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। उनके दल बदलने से अलवर की जिला परिषद राजनीति में नए समीकरण बने।इस बार मुकाबले को दिलचस्प बनाने वाला एक पहलू यह भी है कि जिला प्रमुख पद के पिछले कार्यकाल से जुड़े राजनीतिक चेहरे अब बदले हुए दलगत समीकरणों के बीच मौजूद हैं। ऐसे में चुनाव के बाद कौन-सा दल सदस्यों का पर्याप्त समर्थन जुटा पाता है, यह अहम रहेगा।
नए जिलों के गठन से बदला सीटों का गणित
खैरथल-तिजारा और कोटपूतली-बहरोड़ जिलों के गठन के बाद अलवर जिला परिषद का क्षेत्र और सीटों का गणित बदल गया है। पहले जिला परिषद में 49 सदस्य थे, जबकि अब सदस्यों की संख्या घटकर 39 रह गई है।सीटों की संख्या में बदलाव के कारण पिछले चुनावों के परिणामों से इस बार के मुकाबले की सीधी तुलना करना आसान नहीं है। नए भौगोलिक समीकरणों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक प्रभाव और स्थानीय मुद्दे भी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।भाजपा के लिए चुनौती केवल अधिक सीटें जीतने की नहीं, बल्कि जिला परिषद में ऐसा समर्थन जुटाने की भी होगी, जिससे उसका बोर्ड बन सके। दूसरी ओर कांग्रेस अपने पुराने प्रभाव को बनाए रखने के लिए प्रयासरत है।
टीकाराम जूली ने कांग्रेस की जीत का दावा किया
पंचायती राज चुनाव के बीच नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने दावा किया है कि कांग्रेस को गांव की सरकार बनाने के चुनाव में अपार सफलता मिलेगी। उनके बयान के बाद दोनों दलों के समर्थकों के बीच राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।कांग्रेस इस चुनाव को ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी संगठनात्मक पकड़ बनाए रखने के अवसर के रूप में देख रही है। वहीं भाजपा के सामने राज्य में अपनी सरकार होने के बावजूद जिला परिषद में मजबूत प्रदर्शन करने की चुनौती है।हालांकि, नेताओं के दावों से चुनाव परिणाम तय नहीं होते। अंतिम तस्वीर मतदान की गिनती और जिला परिषद सदस्यों के समर्थन के बाद ही स्पष्ट होगी।
क्या भाजपा तोड़ पाएगी कांग्रेस का पुराना दबदबा?
अलवर जिला परिषद का चुनाव इस बार कई कारणों से महत्वपूर्ण हो गया है। कांग्रेस पिछले करीब दो दशकों के अपने प्रभाव को बरकरार रखना चाहती है। भाजपा इस इतिहास को बदलकर जिला प्रमुख की कुर्सी हासिल करने की कोशिश में है।वर्ष 2015 का चुनाव दिखा चुका है कि बहुमत के बावजूद आंतरिक मतभेद राजनीतिक परिणाम बदल सकते हैं। वहीं, वर्ष 2021 के बाद बदले दलगत समीकरण इस मुकाबले को और पेचीदा बनाते हैं।अब सभी की नजरें दोनों चरणों के चुनाव परिणामों पर टिकी हैं। इसके बाद जिला प्रमुख पद के लिए समर्थन जुटाने की रणनीति सामने आएगी। क्या भाजपा अलवर जिला परिषद में अपना बोर्ड बना पाएगी, या कांग्रेस एक बार फिर जिला प्रमुख की कुर्सी पर कब्जा बरकरार रखेगी? इसका जवाब चुनाव परिणाम और उसके बाद बनने वाले राजनीतिक समीकरण देंगे।