किशनगढ़बास की मैत्रेयी पालावत घूमर को दिला रहीं नई पहचान, अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने का सपना
राजस्थान के पारंपरिक लोकनृत्य घूमर को नई पहचान दिलाने में किशनगढ़बास की मैत्रेयी पालावत अहम भूमिका निभा रही हैं। बचपन में दादी, नानी और मां को त्योहारों पर घूमर करते देखकर उनके मन में इस नृत्य के प्रति लगाव पैदा हुआ। वर्ष 2017 में उन्होंने सोशल मीडिया पर घूमर के वीडियो साझा करने शुरू किए। धीरे-धीरे उनकी पहचान बढ़ी और वे सांस्कृतिक आयोजनों तक पहुंचीं। मैत्रेयी अब तक हजारों छात्राओं और महिलाओं को घूमर का प्रशिक्षण देने का दावा करती हैं। उनका लक्ष्य राजस्थानी लोकनृत्य को देश के हर राज्य और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाना है।
दादी-नानी को देखकर शुरू हुआ घूमर का सफर
किशनगढ़बास में जन्मी मैत्रेयी पालावत का घूमर से जुड़ाव बचपन से रहा है। संयुक्त परिवार में रहते हुए उन्होंने दादी, नानी और मां को गणगौर व तीज जैसे त्योहारों पर पारंपरिक घूमर करते देखा। इन्हीं अनुभवों ने उनके भीतर राजस्थानी लोकनृत्य के प्रति रुचि पैदा की। हालांकि, उस समय परिवार में नृत्य को करियर के रूप में आगे बढ़ाने का माहौल नहीं था। उनके दादाजी को नृत्य पसंद नहीं था, इसलिए शुरुआती दिनों में वे अपने शौक को पेशेवर रूप नहीं दे सकीं। शादी के बाद परिस्थितियां बदलीं और उन्हें अपने पुराने सपने को पूरा करने का अवसर मिला।
मुंबई में सीखा प्रशिक्षण, फिर घूमर को बनाया पहचान
शादी के बाद मैत्रेयी मुंबई पहुंचीं, जहां उन्होंने जुंबा की लाइसेंस प्राप्त प्रशिक्षक बनने का प्रशिक्षण लिया। इसी दौरान उन्हें भरतनाट्यम सीखने का अवसर भी मिला। नृत्य से जुड़ी इस सीख ने उनके पुराने शौक को आगे बढ़ाने का रास्ता खोला। इसके बाद उन्होंने पारंपरिक घूमर को अपनी पहचान बनाने का फैसला किया। उनके लिए यह केवल नृत्य सीखने या सिखाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजस्थान की लोक परंपराओं को आगे बढ़ाने का माध्यम बन गया। धीरे-धीरे उन्होंने इस दिशा में प्रयास शुरू किए और सोशल मीडिया के जरिए अपनी प्रस्तुतियों को अधिक लोगों तक पहुंचाने लगीं।
2017 में सोशल मीडिया से शुरू हुई नई पहचान
मैत्रेयी ने वर्ष 2017 में घूमर के वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करना शुरू किया। शुरुआती दौर में उन्हें पिता की नाराजगी का सामना करना पड़ा। हालांकि, उनके पति और मां ने उनका समर्थन किया और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। समय के साथ उनके वीडियो को दर्शक मिलने लगे और उनकी पहचान बढ़ने लगी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उनके यूट्यूब चैनल पर करीब 25 हजार, इंस्टाग्राम पर 50 हजार और फेसबुक पर 50 हजार फॉलोअर्स हैं। सोशल मीडिया से शुरू हुआ यह सफर अब सांस्कृतिक कार्यक्रमों और मंचीय प्रस्तुतियों तक पहुंच चुका है।
सरकारी घूमर महोत्सव में भी मिली जगह
मैत्रेयी के लिए वर्ष 2025 एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। राजस्थान सरकार के घूमर महोत्सव के प्रचार के लिए तैयार पोस्टरों, प्रमाणपत्रों और ट्रॉफियों पर उनकी तस्वीर शामिल की गई। यह उनके सांस्कृतिक प्रयासों को मिली पहचान के रूप में देखा गया। इसके अलावा, वे विभिन्न घूमर प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार जीत चुकी हैं। गणतंत्र दिवस के अवसर पर उन्होंने 111 विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देकर सामूहिक घूमर प्रस्तुति तैयार करवाई। इससे पारंपरिक नृत्य को नई पीढ़ी से जोड़ने का प्रयास भी सामने आया। उनकी गतिविधियां व्यक्तिगत उपलब्धियों के साथ-साथ लोकनृत्य के प्रचार पर केंद्रित हैं।
हजारों छात्राओं और महिलाओं को दे चुकी हैं प्रशिक्षण
मैत्रेयी पालावत के अनुसार, वे अब तक सवा लाख लोगों को घूमर का प्रशिक्षण दे चुकी हैं। इसके अलावा, स्कूलों और कॉलेजों में कार्यशालाओं के माध्यम से पांच हजार से अधिक छात्राओं और महिलाओं को नृत्य सिखाने की जानकारी भी दी गई है। इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों का उद्देश्य पारंपरिक घूमर की जानकारी अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है। स्कूलों और कॉलेजों में ऐसे आयोजन युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का अवसर देते हैं। मैत्रेयी का प्रयास है कि घूमर केवल त्योहारों या विशेष आयोजनों तक सीमित न रहे, बल्कि इसे नियमित रूप से सीखने और प्रस्तुत करने की परंपरा भी विकसित हो।
‘मैत्रेयी बाईसा ग्रुप’ के जरिए संस्कृति संरक्षण की पहल
राजस्थानी संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए मैत्रेयी ने ‘मैत्रेयी बाईसा ग्रुप’ बनाया है। इस समूह के माध्यम से वे घूमर के साथ राजपूताना संस्कृति के प्रचार और संरक्षण में जुटी हैं। उनके लिए घूमर राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा लोकनृत्य है। वे चाहती हैं कि इसकी पारंपरिक शैली और भावी पीढ़ियों तक पहुंचने वाली विरासत सुरक्षित रहे। समूह के जरिए मंचीय प्रस्तुतियों और सांस्कृतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। मैत्रेयी का मानना है कि लोककलाओं को जीवित रखने के लिए उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना और व्यापक मंच देना जरूरी है।
देश के हर राज्य और विदेशों तक घूमर पहुंचाने का लक्ष्य
मैत्रेयी पालावत का सपना घूमर को राजस्थान से बाहर देश के हर राज्य और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाना है। सोशल मीडिया, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए वे इस दिशा में प्रयास कर रही हैं। घूमर राजस्थान की पारंपरिक सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। ऐसे में इसे व्यापक मंच मिलने से देश-दुनिया के दर्शकों तक राज्य की लोकपरंपराओं को पहुंचाने का अवसर मिल सकता है। मैत्रेयी की यात्रा यह भी दिखाती है कि व्यक्तिगत रुचि, परिवार का सहयोग और निरंतर प्रयास किसी पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।