डालडा की पूरी कहानी: 90 के दशक की रसोई से गायब हुआ पीला डिब्बा आखिर कहां गया?
अगर आपका बचपन 90 के दशक या साल 2000 के आसपास बीता है, तो आपको घर की रसोई का एक पीला डिब्बा जरूर याद होगा। गोल आकार का यह डिब्बा अक्सर गैस चूल्हे या राशन वाले स्लैब के पास रखा दिखाई देता था। उस पर हरे रंग का पाम ट्री बना होता था और नाम लिखा होता था—डालडा।उस दौर में डालडा सिर्फ वनस्पति घी का एक ब्रांड नहीं था। यह भारतीय मिडिल क्लास की रसोई का हिस्सा बन चुका था। पूरियां तलनी हों, हलवा बनाना हो या त्योहार पर पकवान तैयार करने हों, डालडा का इस्तेमाल आम बात थी।लेकिन आज वही पीला डिब्बा ज्यादातर घरों की रसोई से गायब हो चुका है। उसकी जगह रिफाइंड ऑयल और दूसरे कुकिंग ऑयल ने ले ली। आखिर डालडा की ऐसी क्या कहानी थी कि एक समय वह भारत की रसोई पर राज करता था और फिर धीरे-धीरे उसकी लोकप्रियता कम हो गई?
जब देसी घी हर किसी की पहुंच में नहीं था
डालडा की कहानी समझने के लिए हमें 1930 के दशक के भारत में जाना होगा। उस समय खाना पकाने के लिए मुख्य रूप से देसी घी और सरसों के तेल जैसे पारंपरिक विकल्प इस्तेमाल होते थेदेसी घी को भारतीय समाज में स्वाद और धार्मिक शुद्धता से जोड़ा जाता था। लेकिन इसकी कीमत आम परिवारों के लिए बड़ी चुनौती थी। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यम वर्गीय परिवार रोजाना देसी घी का इस्तेमाल नहीं कर पाते थे।यहीं से सस्ते विकल्प के लिए बाजार तैयार हुआ।
भारत में आया वनस्पति घी
वनस्पति तेल को तकनीकी प्रक्रिया के जरिए ठोस रूप में बदलने की तकनीक यूरोप में विकसित हो चुकी थी। इसी दौर में कासिम हुसैन दादा के कारोबार के जरिए भारत में वनस्पति घी पहुंचा।शुरुआत में इसे दादा वनस्पति के नाम से बेचा गया। इसकी बनावट और रंग काफी हद तक देसी घी जैसा दिखाई देता था, लेकिन कीमत काफी कम थी।इस वजह से यह जल्दी ही आम उपभोक्ताओं के बीच लोकप्रिय होने लगा।
दादा से बना डालडा
भारत में वनस्पति घी की बढ़ती मांग पर ब्रिटिश कंपनी लीवर ब्रदर्स की नजर पड़ी। कंपनी ने दादा ब्रांड से जुड़े अधिकार हासिल किए और भारत में इसका उत्पादन शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ाया।ब्रांड नाम को लेकर कासिम हुसैन दादा की एक शर्त थी। भारत में प्रोडक्ट के नाम में ‘दादा’ शब्द बना रहना चाहिए।बाद में इस नाम के बीच लीवर ब्रदर्स का ‘L’ जोड़कर एक नया नाम तैयार किया गया—Dalda।1937 में डालडा ब्रांड भारतीय बाजार में सामने आया और आने वाले दशकों में यह नाम वनस्पति घी का पर्याय बन गया।
डालडा को घर-घर पहुंचाने वाली मार्केटिंग
डालडा की सफलता सिर्फ सस्ते होने की वजह से नहीं थी। इसके पीछे जबरदस्त मार्केटिंग रणनीति भी थी।विज्ञापन एजेंसी लिंटास ने ऐसे प्रचार अभियान तैयार किए, जिनमें लोगों को डालडा का स्वाद खुद महसूस करने का मौका दिया गया। बताया जाता है कि बड़े-बड़े डालडा डिब्बे जैसे वाहनों के जरिए प्रचार किया जाता था।लोगों को जलेबी और कचौड़ी जैसे खाद्य पदार्थ खिलाकर उनसे पूछा जाता था कि इसमें देसी घी इस्तेमाल हुआ है या वनस्पति घी।जब लोग स्वाद पहचान नहीं पाते, तो उन्हें बताया जाता कि यह डालडा से तैयार किया गया है।यह उस दौर की शुरुआती सेंसरी मार्केटिंग रणनीतियों में से एक मानी जाती है।
डालडा को मिली कड़ी टक्कर
डालडा की सफलता के बाद वनस्पति घी के बाजार में कई नए ब्रांड आए। 1940 के दशक में गगन और पनखट जैसे ब्रांड बाजार में दिखाई दिए।बाद में रथ वनस्पति घी भी घरेलू बाजार में पहुंचा। कंपनियों ने अलग-अलग रणनीतियों के जरिए उपभोक्ताओं को आकर्षित किया।किसी ने स्वास्थ्य और विटामिन की बात की तो किसी ने परिवार और भावनाओं को विज्ञापनों का हिस्सा बनाया।इस तरह वनस्पति घी भारतीय रसोई में तेजी से फैलता गया।
फिर शुरू हुआ ‘नकली घी’ का विवाद
1950 के दशक में वनस्पति घी को लेकर विरोध भी शुरू हुआ। आरोप लगाए जाने लगे कि इसे सस्ता बनाने के लिए पशु चर्बी का इस्तेमाल किया जा रहा है।डेयरी किसानों और देसी घी कारोबार से जुड़े लोगों की ओर से भी वनस्पति घी का विरोध हुआ। यह आरोप भी लगाए गए कि वनस्पति घी को असली घी में मिलाकर बेचा जा रहा है।मामला इतना बड़ा हुआ कि सड़क से लेकर संसद तक इसकी चर्चा होने लगी।हालांकि उस समय पशु चर्बी मिलाने के आरोपों को साबित करने वाला ठोस प्रमाण सामने नहीं आया।
वनस्पति घी बनता कैसे था?
वनस्पति घी बनाने की पारंपरिक औद्योगिक प्रक्रिया में हाइड्रोजनेशन का इस्तेमाल किया जाता था।इस प्रक्रिया में वनस्पति तेल को हाइड्रोजन के साथ रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा जाता था। इसका उद्देश्य तेल को अधिक ठोस और लंबे समय तक टिकाऊ बनाना था।इस प्रक्रिया में निकेल जैसे कैटलिस्ट का इस्तेमाल किया जाता था। हाइड्रोजनेशन के दौरान तेल की संरचना बदलती थी और वह कमरे के तापमान पर अर्ध-ठोस रूप ले सकता था।लेकिन इसी प्रक्रिया के एक रूप यानी पार्शियल हाइड्रोजनेशन से ट्रांस फैट बनने की समस्या सामने आई।
ट्रांस फैट ने बदल दी डालडा की कहानी
1990 के दशक में ट्रांस फैट को लेकर वैज्ञानिक जानकारी तेजी से सामने आने लगी। शोध में ट्रांस फैट को खराब LDL कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने और अच्छे HDL कोलेस्ट्रॉल को कम करने से जोड़ा गया।दिल की बीमारियों से इसका संबंध भी सामने आया।इसके बाद उपभोक्ताओं की सोच बदलने लगी। लोग ऐसे तेलों की तलाश करने लगे, जिन्हें कम ट्रांस फैट और बेहतर स्वास्थ्य विकल्प के रूप में पेश किया जा रहा था।यहीं से रिफाइंड और दूसरे एडिबल ऑयल ब्रांड्स के लिए बाजार तेजी से खुला।
1980 और 90 के दशक के विवादों ने भी असर डाला
वनस्पति घी को लेकर समय-समय पर पशु चर्बी और मिलावट से जुड़ी खबरें भी सामने आती रहीं। कुछ स्थानीय उत्पादकों पर चर्बी मिलाने के आरोप लगे।हालांकि हर ब्रांड को इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। लेकिन वनस्पति घी की पूरी श्रेणी की छवि पर इसका असर पड़ा।डालडा सबसे बड़ा नाम था। इसलिए वनस्पति घी से जुड़ी नकारात्मक धारणा का असर उस पर भी पड़ा।
2003 में डालडा का मालिकाना बदला
समय के साथ डालडा की घरेलू लोकप्रियता कम होती गई। स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं और बदलती उपभोक्ता पसंद के बीच 2003 में हिंदुस्तान यूनिलीवर ने डालडा ब्रांड को अमेरिकी कंपनी Bunge को बेच दिया।इस सौदे के बाद डालडा भारतीय बाजार में एक नए मालिक के साथ आगे बढ़ा।लेकिन तब तक भारतीय रसोई की तस्वीर काफी बदल चुकी थी।
क्या डालडा पूरी तरह खत्म हो गया?
नहीं। यही इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है।डालडा का घरेलू इस्तेमाल पहले जैसा नहीं रहा, लेकिन वनस्पति घी का इस्तेमाल पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।खासकर हलवाई, बेकरी, रेस्टोरेंट, होटल और फूड इंडस्ट्री में वनस्पति और दूसरे सेमी-सॉलिड फैट्स का इस्तेमाल जारी रहा।यानी पीला डिब्बा हमारी नजरों से भले गायब हो गया, लेकिन वनस्पति घी बाजार से गायब नहीं हुआ।
नई तकनीक ने बदली वनस्पति घी की तस्वीर
ट्रांस फैट को लेकर बढ़ती चिंताओं के बाद उद्योग ने ऐसी तकनीकों पर काम किया, जिनसे बिना पार्शियल हाइड्रोजनेशन के भी फैट को वांछित बनावट दी जा सके।इनमें इंटरएस्टरीफिकेशन जैसी तकनीक शामिल है। इसमें फैटी एसिड की संरचना को पुनर्व्यवस्थित किया जाता है, ताकि मिश्रण को वांछित ठोस या अर्ध-ठोस रूप दिया जा सके।इस तकनीक का इस्तेमाल ट्रांस फैट कम करने वाले उत्पाद तैयार करने में किया जा सकता है। हालांकि किसी भी खाद्य उत्पाद की सेहत से जुड़ी गुणवत्ता उसके पूरे पोषण प्रोफाइल और इस्तेमाल की मात्रा पर निर्भर करती है।
आज भी मौजूद है डालडा की विरासत
आज नई पीढ़ी के लिए डालडा शायद सिर्फ एक पुराना ब्रांड नाम हो। लेकिन 90 के दशक की पीढ़ी के लिए इसका पीला डिब्बा बचपन की यादों का हिस्सा है।गुजिया, पूरियां, हलवा, कचौड़ी और त्योहारों की मिठाइयों से जुड़ी इसकी खुशबू आज भी कई लोगों को पुरानी रसोई की याद दिलाती है।डालडा की कहानी सिर्फ एक ब्रांड के उत्थान और गिरावट की कहानी नहीं है। यह भारत में बदलती अर्थव्यवस्था, विज्ञापन, खाद्य तकनीक और उपभोक्ता सोच की कहानी भी है।जिस उत्पाद ने कभी देसी घी के सस्ते विकल्प के रूप में भारतीय बाजार में जगह बनाई थी, वह समय के साथ स्वास्थ्य संबंधी बहसों का हिस्सा बना। फिर तकनीक बदली और बाजार ने भी अपना रूप बदल लिया।
पीला डिब्बा आज भले हर रसोई में नजर नहीं आता, लेकिन भारतीय खाद्य इतिहास में डालडा की जगह आज भी खास है।