राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव पर ब्रेक, छात्र नेताओं ने बदली सियासत की राह
राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव नहीं होने का असर छात्र राजनीति पर दिखाई देने लगा है। वर्ष 2022 के बाद प्रदेश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए। चुनावी मंच नहीं मिलने के कारण कई छात्र नेताओं ने अब स्थानीय राजनीति का रुख किया है। हालिया निकाय चुनाव में कुछ पूर्व छात्र नेता पार्षद बने। वहीं कई युवा अब पंचायत और जिला परिषद चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। इससे छात्र राजनीति से निकले युवाओं की राजनीतिक गतिविधियों का दायरा कैंपस से बाहर बढ़ता नजर आ रहा है।
छात्रसंघ चुनाव नहीं होने से बदला रास्ता
राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव आखिरी बार 2022-23 सत्र में हुए थे। इसके बाद 2023 से लगातार चुनाव नहीं हो सके। वर्ष 2026 में भी छात्रसंघ चुनाव को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है।इस बीच छात्र संगठनों की ओर से चुनाव बहाली की मांग को लेकर प्रदर्शन भी किए गए। वहीं सरकार ने अदालत में शैक्षणिक कैलेंडर और प्रशासनिक कारणों का हवाला दिया है। 2026 में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 2025-26 चुनावों से जुड़े एकलपीठ के व्यापक निर्देशों पर अंतरिम रोक भी लगाई थी।
निकाय चुनाव में छात्र राजनीति से निकले चेहरे
छात्रसंघ चुनाव का मंच बंद होने के बाद कई पूर्व छात्र नेताओं ने स्थानीय निकाय चुनावों में किस्मत आजमाई। इनमें राजस्थान कॉलेज से छात्र राजनीति में सक्रिय रहे मानवेन्द्र सिंह का नाम शामिल है। वे जयपुर नगर निगम पार्षद निर्वाचित हुए।पत्रकारिता विश्वविद्यालय की पूर्व संयुक्त सचिव नेहा शर्मा ने थानागाजी नगर पालिका से चुनाव लड़ा और पार्षद बनीं। राजस्थान विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से जुड़े रघुनाथ विश्नोई भी निकाय चुनाव जीतकर पार्षद बने।वहीं एनएसयूआई के पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता रमेश भाटी ने खुद चुनाव लड़ने के बजाय अपनी पत्नी को जयपुर नगर निगम चुनाव में मैदान में उतारा। उनकी पत्नी पार्षद निर्वाचित हुईं।
अब पंचायत चुनाव पर नजर
छात्र राजनीति से जुड़े कई युवा अब पंचायत चुनावों की तैयारी में जुटे हैं। राजस्थान विश्वविद्यालय में एनएसयूआई से जुड़े रहे विजय पाल कुड़ी सीकर जिला परिषद से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।एनएसयूआई के पूर्व राष्ट्रीय सचिव धर्मवीर लांबा झुंझुनूं पंचायत समिति से चुनावी मैदान में उतरने की कोशिश कर रहे हैं। राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता महेश सामोता भी सीकर जिला परिषद से प्रयास कर रहे हैं।पूर्व शोध छात्रसंघ अध्यक्ष रामस्वरूप ओला जयपुर जिला परिषद से सक्रिय हैं। वहीं एनएसयूआई के पूर्व जिला अध्यक्ष राजेंद्र चौधरी दूदू से चुनावी तैयारी कर रहे हैं। राजस्थान विश्वविद्यालय से जुड़े रहे चेतन यादव भी जयपुर जिला परिषद से चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं।
छात्र राजनीति से स्थानीय राजनीति तक सफर
छात्रसंघ चुनावों को लंबे समय तक राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने के मंच के तौर पर देखा जाता रहा है। कैंपस चुनावों के जरिए युवा संगठनात्मक काम और चुनावी गतिविधियों से जुड़ते हैं।लेकिन राजस्थान में लगातार चुनाव नहीं होने से छात्र नेताओं के सामने राजनीतिक सक्रियता बनाए रखने का अलग रास्ता सामने आया है। निकाय चुनाव और अब पंचायत चुनाव उनके लिए स्थानीय स्तर पर राजनीति में आगे बढ़ने का माध्यम बन रहे हैं।
दिल्ली में चुनाव, राजस्थान में इंतजार
दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव हो रहे हैं, जबकि राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है। राजस्थान में 2023 से चुनाव नहीं हुए हैं।छात्र संगठनों की ओर से कई बार चुनाव कराने की मांग की गई है। दिसंबर 2025 में राजस्थान हाईकोर्ट के एकलपीठ के आदेश में लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुसार वार्षिक चुनाव का उल्लेख हुआ था। हालांकि 2026 में खंडपीठ ने उस आदेश के कुछ व्यापक निर्देशों पर अंतरिम रोक लगा दी।
नेताओं ने भी उठाई चुनाव कराने की मांग
पूर्व मंत्री प्रताप खाचरियावास ने छात्रसंघ चुनावों को युवाओं की राजनीतिक भागीदारी से जोड़ते हुए चुनाव कराने की मांग की है। उनका कहना है कि छात्र राजनीति युवाओं को आगे बढ़ने का अवसर देती है।पूर्व महापौर अशोक लाहोटी ने भी छात्रसंघ चुनाव जल्द कराने की मांग का समर्थन किया है। उनके अनुसार युवाओं की राजनीतिक भागीदारी जरूरी है और छात्रसंघ चुनाव इस दिशा में शुरुआती मंच हो सकते हैं।फिलहाल राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव की अगली तारीख को लेकर कोई स्पष्ट कार्यक्रम सामने नहीं आया है। ऐसे में छात्र राजनीति से जुड़े युवाओं का स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों की ओर बढ़ना प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।