लोकतंत्र की अनूठी मिसाल: राजस्थान के इस गांव में 40 साल से नहीं हुआ चुनाव, सर्वसम्मति से चुनते हैं वार्ड पंच
राजस्थान के बांसवाड़ा जिले का उमराखाल गांव लोकतांत्रिक परंपरा की एक अलग मिसाल पेश कर रहा है। यहां पिछले करीब 40 साल से वार्ड पंच का चुनाव नहीं हुआ है। गांव के करीब 150 परिवार एक साथ बैठकर सर्वसम्मति से वार्ड पंच का नाम तय करते हैं। इस परंपरा में चुनावी प्रतिस्पर्धा के बजाय आपसी सहमति को प्राथमिकता दी जाती है। केसरपुरा ग्राम पंचायत के इस गांव में इस बार भी ग्रामीणों ने सामूहिक बैठक कर निर्विरोध वार्ड पंच चुनने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है।
150 परिवार और करीब 450 मतदाता
जिला मुख्यालय से करीब 13 किलोमीटर दूर स्थित उमराखाल गांव में लगभग 150 परिवार रहते हैं। गांव में करीब 450 मतदाता हैं।हर पांच साल में होने वाले पंचायत चुनाव के दौरान यहां आम चुनाव की तरह उम्मीदवारों के बीच मुकाबला नहीं होता। ग्रामीण सामूहिक बैठक में बैठकर आपसी सहमति से वार्ड पंच के लिए नाम तय करते हैं।इस बार भी ग्रामीणों ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाने का फैसला किया है।
जाजम पर बैठकर तय होता है वार्ड पंच
गांव में निर्णय लेने की प्रक्रिया सामूहिक बैठक के जरिए होती है। हाल ही में माताजी मंदिर परिसर में एकता ग्राम संगठन उमराखाल की बैठक आयोजित की गई।दिनेश मईड़ा की अध्यक्षता में हुई बैठक में ग्रामीणों ने वार्ड पंच के नाम पर चर्चा की। बैठक में सतवीर निनामा या उनकी पत्नी को निर्विरोध वार्ड पंच बनाने का प्रस्ताव रखा गया।अंतिम प्रक्रिया चुनाव नियमों के तहत पूरी होने के बाद ही निर्विरोध निर्वाचन की स्थिति स्पष्ट होगी।
40 साल से कायम है परंपरा
ग्रामीणों के मुताबिक, उमराखाल में करीब चार दशक से वार्ड पंच का चुनाव निर्विरोध होता आया है।इस परंपरा का उद्देश्य गांव में चुनावी प्रतिस्पर्धा के कारण पैदा होने वाले मतभेद और आपसी तनाव से बचना बताया जाता है। ग्रामीण सामूहिक सहमति से प्रतिनिधि चुनते हैं और गांव के विकास से जुड़े कामों में भी सामूहिक भागीदारी की कोशिश करते हैं।
शराब, तंबाकू और अंधविश्वास के खिलाफ भी फैसले
गांव के समाजसेवी दिनेश मईड़ा के अनुसार, उमराखाल में सामाजिक सुधार से जुड़े कई फैसले भी सामूहिक रूप से लिए गए हैं।ग्रामीणों ने शराब, डीजे, तंबाकू सेवन और अंधविश्वास जैसी सामाजिक बुराइयों पर रोक लगाने के प्रयास किए हैं। गांव में इस तरह के नियमों को सामूहिक सहमति से लागू करने की बात कही गई है।
नियम तोड़ने पर जुर्माने की व्यवस्था
ग्रामीणों के अनुसार, गांव में तय सामाजिक नियमों का उल्लंघन करने पर आर्थिक जुर्माने का प्रावधान भी रखा गया है।जुर्माने की राशि का इस्तेमाल सामूहिक विकास कार्यों में किए जाने की बात कही गई है। ग्रामीणों के सामूहिक प्रयासों से गांव में सामुण्डा माताजी मंदिर का निर्माण भी कराया गया है।
सरपंच बोले- बचपन से देख रहे हैं यह परंपरा
केसरपुरा ग्राम पंचायत के सरपंच कालूराम मईड़ा के मुताबिक, गांव में निर्विरोध प्रतिनिधि चुनने की परंपरा उन्होंने बचपन से देखी है।उनके अनुसार, ग्रामीण अब भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। कालूराम मईड़ा खुद भी तीन बार निर्विरोध वार्ड पंच रह चुके हैं।
अब तक इन लोगों का हुआ निर्विरोध निर्वाचन
गांव की जानकारी के अनुसार अब तक कई लोग निर्विरोध वार्ड पंच चुने जा चुके हैं। इनमें शामिल हैं:
- वालू पुत्र केरेंग मईड़ा — 5 साल
- मांगू पुत्र पुंजा — 10 साल
- कालूराम पुत्र शंभु मईड़ा — 15 साल
- शारदा पुत्र कन्हैयालाल — 5 साल
- रमिया पत्नी विकास डोडियार — 5 साल
इन निर्विरोध निर्वाचनों के जरिए गांव ने लंबे समय से चली आ रही अपनी सामूहिक निर्णय की परंपरा को कायम रखा है।
चुनावी कटुता से बचने की कोशिश
उमराखाल की परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ग्रामीण चुनाव को प्रतिस्पर्धा के बजाय सामूहिक सहमति से जोड़ते हैं।वार्ड पंच के लिए नाम तय करने से पहले ग्रामीण एक साथ बैठकर चर्चा करते हैं। इसके बाद जिस नाम पर सहमति बनती है, उसे निर्विरोध चुनाव के लिए आगे बढ़ाया जाता है।हालांकि, औपचारिक निर्विरोध निर्वाचन निर्वाचन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही माना जाएगा। इस बार भी ग्रामीणों की कोशिश इसी परंपरा को जारी रखने की है।