अलवर में बहुमत से दूर BJP-कांग्रेस, निर्दलीय बने किंगमेकर; बोर्ड बनाने में भाजपा आगे
अलवर नगर निगम चुनाव के नतीजों के बाद बोर्ड गठन का गणित बेहद दिलचस्प हो गया है। 65 वार्डों वाले नगर निगम में भाजपा ने 28, कांग्रेस ने 23, बसपा ने एक और निर्दलीयों ने 13 सीटों पर जीत दर्ज की है। बहुमत के लिए 33 पार्षदों का समर्थन जरूरी है। ऐसे में भाजपा बहुमत से 5 सीट दूर है, जबकि कांग्रेस को 10 और पार्षदों के समर्थन की जरूरत है। स्पष्ट बहुमत किसी दल को नहीं मिला है। लिहाजा अब 13 निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन में निर्णायक भूमिका निभाएंगे। मौजूदा समीकरणों में भाजपा बढ़त में दिखाई दे रही है।
भाजपा 28 सीटों के साथ सबसे आगे
अलवर नगर निगम के चुनाव परिणाम में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है। पार्टी ने 65 में से 28 वार्डों में जीत दर्ज की है।
बहुमत का आंकड़ा 33 है। ऐसे में भाजपा को बोर्ड बनाने के लिए पांच और पार्षदों के समर्थन की जरूरत है। यही वजह है कि पार्टी की नजर अब निर्दलीय पार्षदों पर टिकी है।
कांग्रेस के खाते में 23 वार्ड
कांग्रेस ने भी पिछले चुनाव के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। इस बार पार्टी ने 23 वार्डों में जीत दर्ज की है।
कांग्रेस बहुमत से 10 सीट दूर है। पार्टी के सामने निर्दलीयों को अपने साथ जोड़ने की चुनौती भाजपा की तुलना में ज्यादा बड़ी है। हालांकि बोर्ड गठन के लिए अभी राजनीतिक संपर्कों का दौर जारी है।
13 निर्दलीय पार्षद बने किंगमेकर
चुनाव में 13 निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत ने पूरे समीकरण को बदल दिया है। किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने से अब निर्दलीय पार्षदों की भूमिका सबसे अहम हो गई है।
जिस दल को जरूरी संख्या में निर्दलीयों का समर्थन मिल जाता है, उसके लिए बोर्ड बनाना आसान हो जाएगा। यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों निर्दलीय पार्षदों से संपर्क साध रही हैं।
भाजपा के 7-8 निर्दलीयों के समर्थन का दावा
सूत्रों के अनुसार भाजपा करीब 7 से 8 निर्दलीय पार्षदों को अपने पक्ष में लाने में कामयाब हो चुकी है। हालांकि इस समर्थन को लेकर अभी आधिकारिक तौर पर सभी निर्दलीय पार्षदों की स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है।
यदि भाजपा को यह समर्थन औपचारिक रूप से मिल जाता है तो उसके पास बहुमत के लिए जरूरी संख्या से अधिक पार्षद हो सकते हैं। ऐसे में बोर्ड गठन की उसकी स्थिति मजबूत हो जाएगी।
2019 में भाजपा को मिली थी क्रॉस वोटिंग की चोट
अलवर नगर निगम में वर्ष 2019 का चुनाव भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। उस समय भाजपा के पास कांग्रेस से ज्यादा पार्षद होने के बावजूद पार्टी बोर्ड नहीं बना सकी थी।
बताया जाता है कि मेयर चुनाव के दौरान भाजपा के कुछ पार्षदों की क्रॉस वोटिंग के चलते कांग्रेस बोर्ड बनाने में सफल रही थी। यही वजह है कि इस बार भाजपा निर्दलीयों का समर्थन जुटाने के साथ अपने पार्षदों को एकजुट रखने पर भी जोर दे रही है।
इस बार कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर
2019 के मुकाबले कांग्रेस ने इस बार अपनी स्थिति मजबूत की है। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 19 वार्डों में जीत दर्ज की थी। इस बार यह संख्या बढ़कर 23 हो गई है।
यानी कांग्रेस को चार सीटों का फायदा हुआ है। भाजपा भी 2019 के 27 वार्डों से बढ़कर इस बार 28 पर पहुंची है। वहीं निर्दलीय और अन्य दलों की संयुक्त सीटें पिछले चुनाव के 19 से घटकर 14 रह गई हैं।
मेयर चुनाव की तारीखों पर भी नजर
अलवर नगर निगम में मेयर पद के लिए नामांकन की अंतिम तारीख 16 सितंबर है। 18 सितंबर को नाम वापसी होगी, जबकि 21 सितंबर को मतदान प्रस्तावित है।
इन तारीखों के बीच भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने संख्याबल को मजबूत करने की कोशिश करेंगी। निर्दलीय पार्षदों की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण रहने वाली है।
भाजपा के सामने दोहरी चुनौती
भाजपा के सामने फिलहाल दो बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, जरूरी निर्दलीय पार्षदों का समर्थन हासिल करना। दूसरी, अपने 28 पार्षदों को एकजुट रखना।
2019 का अनुभव पार्टी को क्रॉस वोटिंग को लेकर सतर्क कर रहा है। ऐसे में बोर्ड गठन से पहले पार्षदों की बाड़ेबंदी और एकजुटता पर भी पार्टी का फोकस रह सकता है।
21 सितंबर तक जारी रहेगा सियासी जोड़-तोड़
अलवर नगर निगम में बोर्ड गठन की तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं हुई है। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होने के साथ बहुमत के सबसे करीब है। वहीं कांग्रेस भी निर्दलीयों के जरिए समीकरण बदलने की कोशिश कर सकती है।
अब 21 सितंबर तक समर्थन जुटाने, संपर्क साधने और राजनीतिक रणनीति बनाने का दौर जारी रहने की संभावना है। फिलहाल 13 निर्दलीय पार्षद ही तय करेंगे कि अलवर नगर निगम की सत्ता किसके हाथ जाएगी।