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BRICS Summit 2026: अमेरिकी मीडिया में क्या हो रही चर्चा? मोदी-शी की रेस से भारत-चीन तनाव तक

खबर का सारांश

नई दिल्ली में BRICS Summit 2026 शुरू हो रहा है। इस सम्मेलन पर अमेरिकी मीडिया की भी खास नजर है। अमेरिका के प्रमुख अखबारों ने BRICS को बदलती वैश्विक व्यवस्था के संकेत के तौर पर देखा है। रिपोर्टों में भारत-चीन संबंध, अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा और ग्लोबल साउथ की भूमिका पर चर्चा की गई है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने सवाल उठाया कि विकासशील देशों की आवाज के रूप में नरेंद्र मोदी या शी जिनपिंग में कौन ज्यादा प्रभावशाली बनकर उभरेंगे। वहीं वॉल स्ट्रीट जर्नल ने भारत-चीन तनाव कम होने की संभावनाओं और सीमाओं पर ध्यान दिया। वॉशिंगटन पोस्ट ने BRICS के भीतर मौजूद मतभेदों को प्रमुख मुद्दा बताया।

NYT: मोदी या शी, कौन बनेगा ज्यादा प्रभावशाली?

द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में BRICS सम्मेलन को लेकर एक अहम सवाल उठाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, देखना होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग में कौन विकासशील दुनिया की ज्यादा प्रभावशाली आवाज बनकर उभरता है। चीन BRICS को अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देने वाले मंच के तौर पर देखता है। वहीं भारत इसे ज्यादा खुला और व्यापक समूह बनाए रखने पर जोर देता है। भारत नहीं चाहता कि देश किसी एक वैश्विक गुट को चुनने के लिए मजबूर हों। रिपोर्ट में युद्ध, ऊर्जा कीमतों, अमेरिकी टैरिफ और AI जैसी चुनौतियों का भी जिक्र है।

भारत से रिश्ते सुधारना चाहता है चीन?

अमेरिकी मीडिया में भारत-चीन संबंधों को भी महत्वपूर्ण मुद्दा माना गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स से बातचीत में स्टिमसन सेंटर की चीन प्रोग्राम डायरेक्टर युन सन ने कहा कि भारत का अमेरिका की ओर झुकाव चीन की प्रमुख चिंताओं में रहा है। ऐसे में बीजिंग भारत के साथ संबंध सुधारने का अवसर नहीं गंवाना चाहेगा। शी जिनपिंग की भारत यात्रा करीब सात साल बाद हो रही है। यह यात्रा 2020 के गलवान संघर्ष के बाद लंबे तनाव और 2024 से शुरू हुई सावधानीपूर्ण कूटनीतिक प्रक्रिया के बीच हो रही है।

वॉल स्ट्रीट जर्नल: तनाव कम करने का मौका

वॉल स्ट्रीट जर्नल ने भारत और चीन के लिए मौजूदा परिस्थितियों को तनाव कम करने के अवसर के तौर पर देखा है। रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिका के साथ दोनों देशों के रिश्तों में आई अनिश्चितता इसका एक कारण है। भारत-अमेरिका संबंधों में रूसी तेल खरीद सहित कई मुद्दों पर तनाव की चर्चा की गई। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली के अनुसार, भारत अपने संबंधों में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, सीमा विवाद और चीन-पाकिस्तान संबंधों के कारण भारत-चीन रिश्तों में सुधार की सीमाएं भी हैं।

भारत-चीन रिश्तों में सुधार कितना टिकाऊ?

अमेरिकी रिपोर्टों में भारत-चीन संबंधों के मौजूदा सुधार को लेकर सावधानी भी दिखाई गई है। सीमा विवाद अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसके अलावा पाकिस्तान के साथ चीन के करीबी संबंध और हिंद महासागर में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी दोनों देशों के बीच चुनौती बने हुए हैं। ऐसे में बातचीत बढ़ने के बावजूद रिश्तों में बड़ा बदलाव आसान नहीं माना जा रहा। दोनों देशों के बीच हालिया कूटनीतिक संपर्क को इसी व्यापक रणनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है।

वॉशिंगटन पोस्ट: BRICS के सामने बड़ी चुनौती

वॉशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्टों में BRICS के बढ़ते प्रभाव और आंतरिक मतभेदों पर चर्चा की गई। समूह के सदस्य वैश्विक व्यवस्था में ज्यादा प्रभाव चाहते हैं। लेकिन उनके राजनीतिक, आर्थिक और विदेश नीति हित एक जैसे नहीं हैं। रिपोर्ट में भारत, रूस और ईरान के संबंधों के साथ पश्चिमी देशों से भारत की बढ़ती साझेदारी का भी उल्लेख किया गया। यूक्रेन और मिडिल ईस्ट के संघर्ष BRICS के भीतर इन अलग-अलग हितों को सामने ला सकते हैं।

ग्लोबल साउथ की एकजुटता पर भी सवाल

BRICS को अक्सर ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज के रूप में पेश किया जाता है। हालांकि, अमेरिकी मीडिया की रिपोर्टों में इसकी एकजुटता को लेकर सवाल भी उठाए गए हैं। अलग-अलग देशों के अपने रणनीतिक और आर्थिक हित हैं। ऐसे में किसी एक मुद्दे पर सभी सदस्यों का एकमत होना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। भारत के लिए यह सम्मेलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसे रूस और ईरान जैसे देशों के साथ संबंधों के बीच अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ साझेदारी भी आगे बढ़ानी है।

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Stv News Rajasthan

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