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POK का मुद्दा: क्या 1947 के फैसले ने बदला भारत का रणनीतिक नक्शा?

: 1947 में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के बाद शुरू हुआ पहला भारत-पाकिस्तान युद्ध आज भी इतिहास और रणनीति की बहस का विषय है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के फैसलों की आज भी आलोचना होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के नियंत्रण में रह जाने से भारत की अफगानिस्तान तक सीधी भौगोलिक पहुंच प्रभावित हुई और पाकिस्तान को चीन के साथ रणनीतिक संपर्क मिला। हालांकि, 1947-49 की परिस्थितियां बेहद जटिल थीं और उस दौर के फैसलों को आज के भू-राजनीतिक परिदृश्य के आधार पर देखना इतिहास को सरल बनाना भी हो सकता है।

1947 में कश्मीर बना सबसे बड़ी चुनौती

भारत की आजादी के समय सैकड़ों रियासतों के भारत या पाकिस्तान में विलय का सवाल सामने था। सरदार वल्लभभाई पटेल और वीपी मेनन के नेतृत्व में अधिकांश रियासतों का भारत में एकीकरण हुआ। जूनागढ़ और जम्मू-कश्मीर के मामले अधिक जटिल रहे। जूनागढ़ के मुस्लिम नवाब ने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया, जबकि वहां आबादी का बड़ा हिस्सा हिंदू था। दूसरी ओर, जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी थी और महाराजा हरि सिंह हिंदू शासक थे। इन परिस्थितियों ने कश्मीर के भविष्य को बेहद संवेदनशील बना दिया।

कबायली हमले के बाद बदले हालात

अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली लड़ाकों के कश्मीर में प्रवेश के बाद स्थिति तेजी से बदली। महाराजा हरि सिंह ने भारत से सैन्य सहायता मांगी और 26 अक्टूबर 1947 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद भारतीय सेना कश्मीर पहुंची और पाकिस्तानी समर्थित हमलावरों के खिलाफ अभियान शुरू किया। भारतीय सेना ने कई क्षेत्रों में बढ़त बनाई, लेकिन युद्ध का अंतिम परिणाम पूरे जम्मू-कश्मीर पर भारत के नियंत्रण के रूप में सामने नहीं आया। बाद में यही क्षेत्र भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे विवाद का आधार बना।

युद्धविराम को लेकर आज भी बहस

कश्मीर युद्ध के दौरान युद्धविराम और संयुक्त राष्ट्र का रुख आज भी राजनीतिक बहस का विषय है। आलोचक मानते हैं कि भारत को सैन्य अभियान जारी रखकर पाकिस्तान के कब्जे वाले हिस्से को वापस लेना चाहिए था। दूसरी ओर, उस समय नवस्वतंत्र भारत के सामने आर्थिक, प्रशासनिक और संवैधानिक चुनौतियां भी थीं। इसलिए यह कहना कि केवल एक व्यक्ति के फैसले से पूरा घटनाक्रम तय हुआ, ऐतिहासिक परिस्थितियों को अत्यधिक सरल बना सकता है। युद्धविराम और संयुक्त राष्ट्र जाने के फैसले को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत रहे हैं।

POK के कारण अफगानिस्तान तक सीधी पहुंच प्रभावित

POK का भू-राजनीतिक महत्व केवल भारत-पाकिस्तान विवाद तक सीमित नहीं है। भारत सरकार के आधिकारिक दृष्टिकोण के अनुसार जम्मू-कश्मीर का वह क्षेत्र भी भारत का हिस्सा है, जिस पर पाकिस्तान का नियंत्रण है। इसी क्षेत्र के कारण भारत की अफगानिस्तान से बताई जाने वाली भूमि सीमा पर प्रत्यक्ष भौगोलिक पहुंच नहीं है। भारत के आधिकारिक मानचित्रों में अफगानिस्तान से लगभग 106 किलोमीटर की सीमा दिखाई जाती है, लेकिन वह क्षेत्र वर्तमान में पाकिस्तान के नियंत्रण वाले इलाके के माध्यम से जुड़ा है। यही कारण है कि POK का रणनीतिक महत्व लगातार बना हुआ है।

पाकिस्तान को मिला चीन से रणनीतिक संपर्क

POK के उत्तरी हिस्से में गिलगित-बाल्टिस्तान की स्थिति भी बेहद महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र चीन के शिनजियांग से जुड़ता है और इसी भौगोलिक संपर्क ने पाकिस्तान-चीन संबंधों को रणनीतिक गहराई दी। खुंजेराब दर्रा दोनों देशों के बीच प्रमुख स्थल संपर्क बिंदु है। बाद में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) जैसी परियोजनाओं ने इस क्षेत्र के महत्व को और बढ़ाया। इस लिहाज से कश्मीर विवाद केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि इसमें चीन का रणनीतिक आयाम भी जुड़ गया।

क्या नेहरू की गलती थी? इतिहासकारों की राय अलग

POK को लेकर जवाहरलाल नेहरू की भूमिका पर दशकों से राजनीतिक और ऐतिहासिक बहस होती रही है। आलोचक युद्ध रोकने और संयुक्त राष्ट्र का रुख करने को रणनीतिक भूल मानते हैं। वहीं दूसरे पक्ष का तर्क है कि 1947-48 की परिस्थितियों में सैन्य, प्रशासनिक और अंतरराष्ट्रीय दबावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उस समय भारत एक नवस्वतंत्र राष्ट्र था और उसके सामने संविधान निर्माण से लेकर आर्थिक पुनर्निर्माण तक कई बड़ी चुनौतियां थीं। इसलिए कश्मीर के घटनाक्रम का मूल्यांकन करते समय तत्कालीन परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

आज भी क्यों महत्वपूर्ण है POK?

आज POK भारत-पाकिस्तान संबंधों में सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है। इसके साथ चीन का जुड़ाव इसे और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है। भारत के लिए यह क्षेत्र जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, पाकिस्तान और चीन के बीच मौजूद व्यापक भू-राजनीतिक समीकरण का हिस्सा है। दूसरी ओर, पाकिस्तान और चीन के बीच बढ़ते रणनीतिक सहयोग ने क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को बदल दिया है। ऐसे में 1947 के फैसलों पर बहस केवल इतिहास तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति से भी जुड़ जाती है।

1947 का फैसला और आज की भू-राजनीति

POK को लेकर यह कहना कि भारत की वर्तमान रणनीतिक चुनौतियों की पूरी जिम्मेदारी केवल नेहरू के एक फैसले पर है, विवादास्पद निष्कर्ष होगा। लेकिन यह भी सच है कि 1947-49 में जम्मू-कश्मीर से जुड़े निर्णयों के दूरगामी परिणाम हुए। पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्रों ने बाद में चीन के साथ उसके भौगोलिक और रणनीतिक संबंधों को मजबूत किया। यही वजह है कि POK आज भी भारत की सुरक्षा नीति, पाकिस्तान संबंधों और चीन के साथ सीमा समीकरण में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

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