नौकरी ही नौकरी: हर सांसद-विधायक 10 हजार युवाओं को रोजगार दिलाए तो क्या बदल सकता है देश?
जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर की ओर से अपने विधानसभा क्षेत्र के 10 हजार युवाओं को निजी क्षेत्र में रोजगार दिलाने की बात ने देश में रोजगार को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि अगर जनप्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्रों में इसी तरह रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी उठाएं, तो इसका राष्ट्रीय स्तर पर कितना बड़ा असर हो सकता है? उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह संख्या करोड़ों तक पहुंच सकती है। हालांकि, इतने बड़े रोजगार लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल जनप्रतिनिधियों की पहल पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि उद्योग, निवेश, कौशल विकास और रोजगार सृजन की मजबूत व्यवस्था भी जरूरी होगी।
प्रशांत किशोर के रोजगार वादे से शुरू हुई नई बहस
प्रशांत किशोर ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव जीतने के बाद अपने क्षेत्र के करीब 10 हजार युवाओं को निजी क्षेत्र में नौकरी दिलाने की बात कही है। उन्होंने युवाओं से बायोडाटा उपलब्ध कराने की अपील भी की। इस पहल ने राजनीतिक वादों में रोजगार के मुद्दे को केंद्र में ला दिया है। आमतौर पर चुनावों के दौरान रोजगार सृजन की बात बड़े स्तर पर की जाती है, लेकिन यदि स्थानीय जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र में कंपनियों और रोजगार देने वाले संस्थानों से समन्वय करें, तो युवाओं के लिए नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं। इसी विचार ने राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े रोजगार मॉडल की चर्चा शुरू की है।
हर सांसद-विधायक 10 हजार रोजगार का लक्ष्य रखे तो?
अगर एक काल्पनिक मॉडल के तौर पर प्रत्येक सांसद और विधायक अपने क्षेत्र के 10 हजार युवाओं को निजी क्षेत्र में रोजगार दिलाने का लक्ष्य रखे, तो संख्या बेहद बड़ी हो सकती है। दिए गए आंकड़ों के आधार पर लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों के साथ देश के हजारों विधायकों को जोड़ने पर यह लक्ष्य कई करोड़ रोजगार अवसरों तक पहुंच सकता है। हालांकि, इसे सीधे पैदा होने वाली नौकरियों की संख्या मानना उचित नहीं होगा। जनप्रतिनिधि स्वयं नौकरियां पैदा नहीं करते, बल्कि उद्योगों, कंपनियों और निवेशकों के साथ मिलकर रोजगार के अवसर बढ़ाने में भूमिका निभा सकते हैं।
करोड़ों नौकरियों के लिए चाहिए मजबूत निजी क्षेत्र
देश में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने के लिए निजी क्षेत्र की क्षमता बढ़ाना सबसे जरूरी है। केवल युवाओं के बायोडाटा जमा करने या कंपनियों से नौकरी मांगने से करोड़ों रोजगार पैदा नहीं हो सकते। इसके लिए नए उद्योगों की स्थापना, छोटे और मध्यम कारोबार का विस्तार, विदेशी निवेश, स्टार्टअप और स्थानीय व्यवसायों को बढ़ावा देना होगा। साथ ही कंपनियों को ऐसे क्षेत्रों में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना होगा जहां बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार मिल सके। मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस सेक्टर, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल सेवाएं और निर्माण क्षेत्र रोजगार बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
केंद्र सरकार के पास कितना सरकारी रोजगार?
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में लाखों कर्मचारी कार्यरत हैं। इसके अलावा केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में भी बड़ी संख्या में लोग रोजगार प्राप्त करते हैं। रेलवे जैसे बड़े सरकारी संस्थान भी इसी रोजगार तंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन देश की विशाल आबादी की तुलना में सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित है। यही वजह है कि हर युवा के लिए सरकारी नौकरी उपलब्ध कराना संभव नहीं है। रोजगार की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए निजी क्षेत्र को रोजगार का बड़ा आधार बनाना होगा और युवाओं को सरकारी नौकरी से आगे भी करियर के विकल्पों के लिए तैयार करना होगा।
सरकारी नौकरी पर निर्भरता से आगे बढ़ना होगा
भारत में सरकारी नौकरी को स्थिरता और सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है। इसके कारण बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। लेकिन सरकारी पदों की संख्या सीमित होने के कारण हर उम्मीदवार को नौकरी मिलना संभव नहीं है। ऐसे में रोजगार नीति का फोकस केवल सरकारी भर्तियों पर रखने के बजाय निजी क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण और स्थायी रोजगार बढ़ाने पर होना चाहिए। इसके लिए युवाओं को उद्योगों की जरूरत के अनुसार कौशल प्रशिक्षण देना भी जरूरी है। यदि प्रशिक्षण और नौकरी के बीच बेहतर तालमेल बने, तो बेरोजगारी की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
जनप्रतिनिधि रोजगार दिलाने में कैसे निभा सकते हैं भूमिका?
सांसद और विधायक सीधे तौर पर निजी कंपनियों में नियुक्तियां नहीं कर सकते, लेकिन वे रोजगार का माहौल तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। अपने क्षेत्र में औद्योगिक निवेश आकर्षित करना, रोजगार मेलों का आयोजन कराना, कंपनियों और युवाओं को जोड़ना, कौशल प्रशिक्षण केंद्रों को बढ़ावा देना तथा स्थानीय कारोबारियों की समस्याएं सरकार तक पहुंचाना उनके काम का हिस्सा हो सकता है। यदि हर क्षेत्र में रोजगार से जुड़ा एक मजबूत स्थानीय नेटवर्क बनाया जाए, तो युवाओं को नौकरी की जानकारी और कंपनियों को प्रशिक्षित कर्मचारी उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। इससे रोजगार सृजन की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो सकती है।
5 करोड़ रोजगार का लक्ष्य कितना आसान?
कई करोड़ रोजगार अवसरों का लक्ष्य सुनने में आकर्षक जरूर है, लेकिन इसे हासिल करना आसान नहीं होगा। इसके लिए बड़ी मात्रा में निजी निवेश और आर्थिक गतिविधियों का विस्तार आवश्यक होगा। इसके साथ यह भी देखना होगा कि पैदा होने वाली नौकरियां केवल अस्थायी या कम वेतन वाली न हों, बल्कि युवाओं को सामाजिक सुरक्षा, उचित वेतन और करियर विकास का अवसर भी दें। रोजगार की संख्या के साथ उसकी गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है। यदि देश को वास्तव में रोजगार क्रांति की ओर ले जाना है तो शिक्षा, कौशल, उद्योग और निवेश की नीतियों को एक-दूसरे से जोड़ना होगा।
रोजगार क्रांति के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति जरूरी
प्रशांत किशोर का प्रस्ताव भले ही एक विधानसभा क्षेत्र से जुड़ा हो, लेकिन इसने रोजगार को लेकर बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है। अगर जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र में रोजगार सृजन को विकास के प्रमुख लक्ष्य के रूप में लें और सरकारें उन्हें उद्योग एवं निवेश से जोड़ने के लिए संस्थागत व्यवस्था तैयार करें, तो इसका व्यापक प्रभाव हो सकता है। देश के युवाओं को केवल सरकारी भर्ती के इंतजार में रखने के बजाय उन्हें निजी क्षेत्र, उद्यमिता और नए कारोबार के अवसरों से जोड़ना जरूरी है। रोजगार की समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव है जब नौकरी मांगने वालों के साथ नौकरी पैदा करने वाली अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो।