‘पुलिस गोली नहीं चला सकती तो आर्म्स ट्रेनिंग का क्या फायदा?’ भरत तिवारी एनकाउंटर पर DGP का बड़ा बयान
भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले को लेकर बिहार के DGP विनय कुमार ने पुलिस के बल प्रयोग और आत्मरक्षा के अधिकार पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि कानून और तय SOP के तहत गंभीर खतरा होने पर पुलिस को आत्मरक्षा में गोली चलाने का अधिकार है। साथ ही DGP ने स्पष्ट किया कि जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने वाले पुलिसकर्मियों पर भी कार्रवाई की गई है। भरत तिवारी मामले में न्यायिक जांच जारी है, जबकि पुलिस की ओर से भी मामले की जांच की गई है।
आत्मरक्षा में पुलिस को गोली चलाने का अधिकार
बिहार DGP विनय कुमार ने कहा कि पुलिसकर्मियों को कानून के तहत अपनी जान बचाने के लिए आत्मरक्षा का अधिकार प्राप्त है। यदि किसी कार्रवाई के दौरान पुलिसकर्मियों की जान पर गंभीर खतरा पैदा होता है, तो परिस्थितियों के अनुसार बल प्रयोग किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पुलिस की कार्रवाई कानून, निर्धारित नियमों और SOP के दायरे में होनी चाहिए। भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में भी इसी पहलू की जांच की जा रही है कि मौके पर परिस्थितियां क्या थीं और बल प्रयोग किस स्थिति में किया गया।
‘गोली नहीं चला सकते तो आर्म्स ट्रेनिंग क्यों?’
DGP ने पुलिस की हथियारों से जुड़ी ट्रेनिंग का जिक्र करते हुए कहा कि अगर पुलिस को गंभीर परिस्थितियों में हथियारों का इस्तेमाल करने का अधिकार ही नहीं होगा, तो आधुनिक हथियारों की ट्रेनिंग देने का उद्देश्य क्या रह जाएगा। उनका कहना था कि पुलिस को हथियार इसलिए दिए जाते हैं ताकि असाधारण और जानलेवा परिस्थितियों में उनका कानून के मुताबिक इस्तेमाल किया जा सके। हालांकि, हथियार का इस्तेमाल परिस्थितियों और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप ही होना चाहिए। पुलिस कार्रवाई की वैधता परिस्थितियों और जांच के तथ्यों से तय होगी।
जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग पर पुलिसकर्मी गिरफ्तार
भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में DGP ने यह भी कहा कि पुलिसकर्मियों को असीमित बल प्रयोग की छूट नहीं है। उन्होंने बताया कि जिस पुलिस अधिकारी पर जरूरत से ज्यादा बल इस्तेमाल करने का आरोप सामने आया, उसे गिरफ्तार किया गया है और उसके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। अन्य अधिकारियों की भूमिका की जांच भी जारी है। इससे DGP का यह संदेश स्पष्ट है कि आत्मरक्षा के अधिकार के साथ पुलिसकर्मियों की जवाबदेही भी बनी रहती है और नियमों का उल्लंघन होने पर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
भरत तिवारी एनकाउंटर की न्यायिक जांच जारी
भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में 17 जून को हुए भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर की न्यायिक जांच अभी जारी है। DGP ने बताया कि पुलिस ने भी इस घटना से जुड़े तथ्यों की जांच की है। न्यायिक जांच के दौरान घटना के हालात, पुलिस की कार्रवाई और बल प्रयोग के कारणों समेत विभिन्न पहलुओं की पड़ताल की जा रही है। ऐसे में मामले की अंतिम तस्वीर जांच पूरी होने और संबंधित तथ्यों के सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी। फिलहाल किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच रिपोर्ट का इंतजार जरूरी है।
भीड़ नियंत्रण में कार्रवाई का तय क्रम
DGP ने भीड़ नियंत्रण की प्रक्रिया का जिक्र करते हुए कहा कि गैर-कानूनी भीड़ से निपटने के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया होती है। उन्होंने बताया कि सामान्य तौर पर पहले चेतावनी देने, इसके बाद स्थिति के अनुसार आंसू गैस और लाठीचार्ज जैसे उपाय अपनाने तथा गंभीर परिस्थितियों में आगे की कार्रवाई करने का प्रावधान है। उनका कहना था कि जब स्थिति हिंसक हो और आगजनी या पथराव जैसी घटनाएं हों, तब पुलिस को कानून के तहत आवश्यक कदम उठाने पड़ते हैं। हालांकि, हर कार्रवाई परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करती है।
‘वर्दी पहनने से नागरिकता खत्म नहीं होती’
DGP विनय कुमार ने पुलिसकर्मियों की मानवीय स्थिति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्दी पहनने के बाद पुलिसकर्मी नागरिक नहीं रह जाता, ऐसा नहीं है। पुलिसकर्मियों के भी परिवार हैं और समाज में उनकी अपनी जिम्मेदारियां हैं। उनके मुताबिक कई मौकों पर पुलिसकर्मी खुद चोटिल होने के बावजूद आम लोगों की सुरक्षा और जान बचाने में जुटे रहते हैं। DGP ने यह बात पुलिस की भूमिका और कठिन परिस्थितियों में उसके सामने आने वाले जोखिमों को समझाने के संदर्भ में कही।
एनकाउंटर पर उठे सवालों के बीच जांच अहम
भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर जहां पुलिस के बल प्रयोग और आत्मरक्षा के अधिकार पर बहस चल रही है, वहीं न्यायिक जांच इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण है। जांच से यह स्पष्ट होना है कि घटना के समय वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं, पुलिस की कार्रवाई किस क्रम में हुई और क्या निर्धारित नियमों का पालन किया गया। साथ ही, यदि किसी पुलिसकर्मी ने कानून की सीमा से बाहर जाकर बल प्रयोग किया है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होना जरूरी है। जांच के निष्कर्ष ही मामले की वास्तविक तस्वीर सामने रखेंगे।