#क्राइम #देश दुनिया

पाक कनेक्शन का स्लीपर सेल नेटवर्क: जयपुर के बाद बंगाल तक पहुंची जांच

इंट्रो: राजस्थान में पाकिस्तानी खुफिया नेटवर्क से जुड़े संदिग्ध स्लीपर सेल मामलों ने साइबर निगरानी और सोशल मीडिया सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जयपुर में बबीता धाकड़ की गिरफ्तारी के बाद पश्चिम बंगाल की अर्पिता से जुड़े मामले ने भी जांच एजेंसियों की चिंता बढ़ाई है। आरोप है कि विदेशी हैंडलर्स सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए महिलाओं को संपर्क में लेकर उन्हें कट्टरपंथी गतिविधियों की ओर धकेलने की कोशिश कर रहे थे। ऐसे मामलों के सामने आने के बाद नागौर समेत संवेदनशील जिलों में डिजिटल गतिविधियों पर निगरानी और साइबर इंटेलिजेंस को मजबूत करने की जरूरत पर सवाल उठ रहे हैं।

जयपुर में बबीता की गिरफ्तारी से खुला नेटवर्क

राजस्थान एटीएस ने जयपुर से बबीता धाकड़ उर्फ ‘खदीजा’ को गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसियों के अनुसार, बबीता कथित तौर पर सोशल मीडिया के जरिए पाकिस्तान से जुड़े कट्टरपंथी हैंडलर्स के संपर्क में आई थी। जांच में उसके धर्म परिवर्तन और ऑनलाइन माध्यम से फिदायीन बनने की कथित ट्रेनिंग से जुड़े आरोप भी सामने आए। एजेंसियों ने यह भी आरोप लगाया कि संवेदनशील और खुफिया जानकारी सीमा पार भेजने की गतिविधियों में उसकी भूमिका थी। मामले में यूएपीए के तहत कार्रवाई की गई और आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेजा गया। अब जांच एजेंसियां नेटवर्क से जुड़े अन्य संपर्कों और डिजिटल गतिविधियों की पड़ताल कर रही हैं।

ऑनलाइन गेम और सोशल मीडिया बना संपर्क का जरिया

जांच से जुड़े दावों में यह बात सामने आई है कि विदेशी हैंडलर्स युवाओं और महिलाओं तक पहुंच बनाने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स के जरिए पहले सामान्य बातचीत और दोस्ती का माहौल बनाया जाता है और इसके बाद कथित तौर पर विचारधारा से प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। ऐसे नेटवर्क में शामिल लोग सीधे किसी संदिग्ध संगठन का नाम सामने नहीं लाते, बल्कि लंबे समय तक डिजिटल संपर्क बनाए रखकर भरोसा हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं। यही वजह है कि साइबर निगरानी को सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

बंगाल की अर्पिता की गिरफ्तारी ने बढ़ाई चिंता

जयपुर के मामले के बाद पश्चिम बंगाल से अर्पिता की गिरफ्तारी की खबर ने भी कथित पाकिस्तानी नेटवर्क की जांच को नया आयाम दिया है। अलग-अलग राज्यों में सामने आ रहे मामलों से सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या इनके पीछे एक संगठित डिजिटल नेटवर्क काम कर रहा है। जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि संदिग्ध लोगों को विदेशी हैंडलर्स तक पहुंचाने के लिए कौन से डिजिटल प्लेटफॉर्म इस्तेमाल किए गए। फिलहाल अलग-अलग मामलों की जांच के आधार पर नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

नागौर में साइबर निगरानी पर उठ रहे सवाल

ऐसे मामलों के सामने आने के बाद नागौर में साइबर निगरानी व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। खास तौर पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर संदिग्ध गतिविधियों की पहचान, विदेशी नंबरों से होने वाले संपर्क और कट्टरपंथी कंटेंट की निगरानी को लेकर प्रभावी तंत्र की जरूरत बताई जा रही है। हालांकि किसी जिले में निगरानी तंत्र को ‘निष्क्रिय’ बताने से पहले संबंधित पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का आधिकारिक पक्ष सामने आना जरूरी है। संवेदनशील मामलों में जांच एजेंसियां अपनी गतिविधियों को सार्वजनिक नहीं करतीं, इसलिए उपलब्ध जानकारी के आधार पर ही स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए।

सीमावर्ती इलाकों में डिजिटल सुरक्षा अहम

राजस्थान के सीमावर्ती और रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था अब केवल भौतिक निगरानी तक सीमित नहीं रह सकती। इंटरनेट और सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल ने विदेशी हैंडलर्स के लिए दूर बैठे लोगों से संपर्क करना आसान बनाया है। ऐसे में स्थानीय पुलिस, साइबर सेल और खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। संदिग्ध डिजिटल गतिविधियों की पहचान के साथ-साथ युवाओं और महिलाओं को ऑनलाइन कट्टरपंथी नेटवर्क के तरीकों के बारे में जागरूक करना भी महत्वपूर्ण है। किसी भी व्यक्ति या समुदाय को केवल संदेह के आधार पर निशाना बनाने के बजाय ठोस डिजिटल और कानूनी साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई जरूरी है।

जांच का फोकस अब नेटवर्क की पूरी कड़ी पर

जयपुर और पश्चिम बंगाल में सामने आए मामलों के बाद जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये अलग-अलग घटनाएं हैं या इनके पीछे कोई साझा डिजिटल नेटवर्क काम कर रहा है। एजेंसियां कथित विदेशी संपर्कों, सोशल मीडिया अकाउंट्स, चैट और वित्तीय लेन-देन समेत अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच कर सकती हैं। यदि किसी संगठित नेटवर्क की पुष्टि होती है तो उसके स्थानीय संपर्कों और मददगारों तक पहुंचना जांच का अगला अहम चरण होगा। फिलहाल उपलब्ध आरोपों को अदालत में साबित करने के लिए जांच एजेंसियों को ठोस और सत्यापित साक्ष्य जुटाने होंगे।

author avatar
Stv News Rajasthan

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *