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अलवर में 655 क्लर्कों की भर्ती पर बड़ा सवाल, बिना दस्तावेज सत्यापन मिली नौकरी

इंट्रो: अलवर जिला परिषद की करीब 13 साल चली लिपिक भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेज सत्यापन को लेकर गंभीर अनियमितताओं का खुलासा जांच में हुआ है। राज्य स्तरीय जांच के मुताबिक दस्तावेजों के आधार पर हुई इस भर्ती में 655 अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी गई, लेकिन उनके दस्तावेजों का आवश्यक स्तर पर सत्यापन नहीं कराया गया। इस भर्ती में न लिखित परीक्षा हुई थी और न ही साक्षात्कार। जांच रिपोर्ट में भर्ती प्रक्रिया से जुड़े अलग-अलग स्तरों पर लापरवाही और नियमों की अनदेखी को रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ अभ्यर्थियों के दस्तावेजों पर आपत्तियां सामने आने के बावजूद उनका विधिवत निस्तारण किए बिना नियुक्तियां देने के मामले भी जांच के दायरे में आए हैं।

13 साल चली भर्ती, 655 अभ्यर्थियों को मिली नियुक्ति

अलवर जिला परिषद की लिपिक भर्ती प्रक्रिया लंबे समय तक चलने के बाद अब जांच के कारण चर्चा में है। राज्य स्तरीय जांच में सामने आया कि इस अवधि में कुल 655 अभ्यर्थियों को लिपिक पद पर नियुक्तियां दी गईं। खास बात यह है कि भर्ती प्रक्रिया दस्तावेजों के आधार पर की गई थी। इसमें चयन के लिए लिखित परीक्षा और साक्षात्कार का प्रावधान नहीं था। ऐसे में अभ्यर्थियों की पात्रता और योग्यता तय करने में दस्तावेज सत्यापन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी। जांच रिपोर्ट में इसी अहम प्रक्रिया के सही तरीके से नहीं होने को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

दस्तावेज सत्यापन नहीं हुआ तो चयन प्रक्रिया पर सवाल

जांच दल के अध्यक्ष अनिल सोनी की रिपोर्ट में दस्तावेज सत्यापन नहीं कराने को गंभीर कमी के तौर पर दर्ज किया गया है। रिपोर्ट में इस स्थिति की तुलना ऐसी प्रक्रिया से की गई है, जिसमें कॉपियां जांचे बिना ही पूरे अंक दे दिए जाएं। दरअसल, जब भर्ती का आधार ही अभ्यर्थियों के शैक्षणिक और अन्य दस्तावेज थे, तब उनकी प्रमाणिकता और पात्रता की जांच जरूरी थी। दस्तावेजों का सत्यापन नहीं होने से यह पता लगाने की प्रक्रिया कमजोर हो गई कि नियुक्ति पाने वाले सभी अभ्यर्थी निर्धारित मानकों पर वास्तव में पात्र थे या नहीं।

तीन स्तरों पर सामने आई सत्यापन में चूक

जांच में दस्तावेज सत्यापन की व्यवस्था में अलग-अलग स्तरों पर लापरवाही का उल्लेख किया गया है। पहला स्तर जिला परिषद की भर्ती सेल से जुड़ा है, जहां भर्ती प्रक्रिया के दौरान दस्तावेजों की जांच नहीं होने की बात सामने आई। दूसरा स्तर उन पंचायत समितियों का था, जहां कई लिपिकों को नियुक्ति मिली। वहां संबंधित विकास अधिकारियों के स्तर पर भी दस्तावेजों के सत्यापन को लेकर सवाल उठे। तीसरे स्तर पर जिला परिषद में नियुक्त लिपिकों के दस्तावेजों की जांच मुख्य कार्यकारी अधिकारी के स्तर पर भी नहीं कराए जाने की बात जांच रिपोर्ट में सामने आई है।

नियम और परिपत्रों के अध्ययन में भी लापरवाही

जांच दल ने भर्ती से संबंधित नियमों और सरकारी परिपत्रों के अध्ययन को लेकर भी सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक यदि भर्ती से जुड़े दिशा-निर्देशों का पूरी तरह अध्ययन किया जाता और उसी आधार पर दस्तावेजों की जांच होती, तो पात्रता संबंधी कई कमियां नियुक्ति से पहले ही सामने आ सकती थीं। दस्तावेज सत्यापन भर्ती प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के बावजूद उससे जुड़े नियमों को प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया गया। जांच रिपोर्ट में इस तरह की प्रक्रिया संबंधी कमियों को भर्ती व्यवस्था की गंभीर कमजोरी के रूप में देखा गया है।

आपत्तियां आईं, फिर भी दे दी गई नियुक्तियां

जांच में भर्ती शाखा की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार दस्तावेज सत्यापन के दौरान कुछ अभ्यर्थियों के कागजात पर आपत्तियां दर्ज की गई थीं। इसके बावजूद इन आपत्तियों का विधिवत निस्तारण कराए बिना ही नियुक्तियां देने की बात सामने आई। वर्ष 2022 में 50 से अधिक अभ्यर्थियों की दस्तावेज सत्यापन चेकलिस्ट पर सत्यापन दल ने आपत्तियां दर्ज की थीं। इसके बाद भी भर्ती शाखा की ओर से अपनी टिप्पणियां दर्ज कर नियुक्तियां जारी किए जाने का उल्लेख जांच में किया गया है। आपत्तियों के निराकरण की प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं हुई, यह जांच का अहम सवाल है।

2013 में अपात्र माने गए, बाद में मिली नौकरी

जांच के दौरान कुछ ऐसे मामले भी सामने आने की बात कही गई है, जिनमें अभ्यर्थियों को वर्ष 2013 में दस्तावेज सत्यापन के दौरान अपात्र माना गया था। आरोप है कि बाद के वर्षों में संबंधित चेकलिस्ट में बदलाव के बाद वर्ष 2018 और 2022 में उन्हीं अभ्यर्थियों को नियुक्तियां मिल गईं। जांच रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2013 में दस्तावेज सत्यापन दल और तत्कालीन मुख्य कार्यकारी अधिकारी की ओर से भी कुछ मामलों में पात्रता पर सवाल दर्ज किए गए थे। इसके बावजूद बाद की प्रक्रियाओं में उन मामलों का अलग परिणाम सामने आया। इस बदलाव की वजह भी जांच के महत्वपूर्ण बिंदुओं में शामिल है।

भर्ती प्रक्रिया में जिम्मेदारी तय होना बाकी

जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि दस्तावेज सत्यापन की अनिवार्य प्रक्रिया क्यों नहीं कराई गई और जिन मामलों में आपत्तियां दर्ज हुईं, उनका समय पर निस्तारण क्यों नहीं किया गया। करीब 13 साल तक चली भर्ती प्रक्रिया में अलग-अलग स्तरों पर अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच की जा रही है। हालांकि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत जिम्मेदारी या किसी अभ्यर्थी की पात्रता पर अंतिम निष्कर्ष संबंधित सक्षम जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही निकाला जा सकेगा। फिलहाल जांच रिपोर्ट ने अलवर जिला परिषद की भर्ती व्यवस्था पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।

अब जांच के निष्कर्ष पर टिकी निगाहें

655 नियुक्तियों से जुड़े इस मामले में जांच रिपोर्ट के बाद आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। जांच में सामने आई अनियमितताओं के आधार पर संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय की जा सकती है। साथ ही जिन अभ्यर्थियों के दस्तावेजों पर आपत्तियां या पात्रता संबंधी सवाल सामने आए हैं, उनके मामलों की अलग से समीक्षा भी संभव है। इस पूरे प्रकरण ने भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेज सत्यापन और प्रशासनिक निगरानी की भूमिका को लेकर बड़ा सवाल खड़ा किया है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि जांच के आधार पर सरकार और जिला प्रशासन आगे क्या कदम उठाते हैं।

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Stv News Rajasthan

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