गैस्ट्रोस्किसिस क्या है? 1.8 किलो के नवजात को 94 दिन के इलाज के बाद मिली नई जिंदगी
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में डॉक्टरों ने एक बेहद दुर्लभ जन्मजात बीमारी से जूझ रहे 1.8 किलोग्राम वजन के नवजात की जान बचाकर चिकित्सा क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। जन्म के समय बच्चे की आंतें पेट के बाहर थीं, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों ने कई चरणों में सर्जरी और लंबे इलाज के बाद उसे स्वस्थ किया। यह मामला गैस्ट्रोस्किसिस (Gastroschisis) जैसी दुर्लभ बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने वाला माना जा रहा है।
मुरादाबाद में डॉक्टरों ने 94 दिनों तक किया जीवन बचाने का संघर्ष
बेंगलुरु निवासी दंपति के नवजात का जन्म मुरादाबाद में हुआ। जन्म के समय बच्चे की आंतें पेट के बाहर थीं और संक्रमण के कारण उनमें गंभीर सूजन थी। नवजात का वजन केवल 1.8 किलोग्राम था, जिससे उपचार और भी चुनौतीपूर्ण हो गया। विशेषज्ञ डॉक्टरों ने तुरंत सर्जरी कर बाहर निकली आंतों को सुरक्षित करने की कोशिश की। सूजन अधिक होने के कारण इलाज कई चरणों में किया गया। बच्चे को लंबे समय तक नसों के माध्यम से पोषण (TPN) दिया गया और बाद में दो अतिरिक्त सर्जरी की गईं। करीब 94 दिनों के उपचार के बाद बच्चा स्वस्थ होकर अस्पताल से घर लौट सका।
क्या है गैस्ट्रोस्किसिस, कैसे होती है यह दुर्लभ बीमारी?
गैस्ट्रोस्किसिस एक जन्मजात विकार (Birth Defect) है, जिसमें गर्भ में शिशु के विकास के दौरान पेट की बाहरी दीवार पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती। आमतौर पर नाभि के पास एक छोटा छेद रह जाता है, जिससे बच्चे की आंतें और कभी-कभी अन्य अंग शरीर के बाहर आ जाते हैं। ये अंग गर्भ में एमनियोटिक द्रव के सीधे संपर्क में रहते हैं, जिससे उनमें सूजन, संक्रमण और क्षति का खतरा बढ़ जाता है। यह बीमारी अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है और समय पर इलाज न मिलने पर गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकती है।
गर्भावस्था में ही चल सकता है बीमारी का पता
विशेषज्ञों के अनुसार गैस्ट्रोस्किसिस की पहचान गर्भावस्था के दौरान ही संभव है। प्रेग्नेंसी के 18 से 20 सप्ताह के बीच होने वाले नियमित अल्ट्रासाउंड में डॉक्टर इस जन्मजात समस्या को आसानी से पहचान सकते हैं। इसके अलावा मां के रक्त में अल्फा-फीटोप्रोटीन (AFP) की बढ़ी हुई मात्रा भी इस बीमारी का संकेत हो सकती है। समय रहते बीमारी का पता चलने पर प्रसव की बेहतर योजना बनाई जा सकती है और जन्म के तुरंत बाद विशेषज्ञ चिकित्सा उपलब्ध कराई जा सकती है।
इलाज में सर्जरी और विशेषज्ञ निगरानी की होती है अहम भूमिका
गैस्ट्रोस्किसिस का मुख्य उपचार सर्जरी है। डॉक्टर पहले बाहर निकले अंगों को संक्रमण से बचाते हैं और फिर स्थिति के अनुसार उन्हें धीरे-धीरे या एक साथ पेट के भीतर स्थापित करते हैं। यदि पेट में पर्याप्त जगह नहीं होती, तो उपचार कई चरणों में किया जाता है। कई मामलों में नवजात को कुछ समय तक नसों के माध्यम से पोषण देना पड़ता है, क्योंकि उसकी आंतें सामान्य रूप से काम करने में समय लेती हैं। उपचार के दौरान नवजात की लगातार निगरानी और संक्रमण से सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण होती है।
समय पर पहचान और इलाज से बढ़ती हैं स्वस्थ होने की संभावनाएं
विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक चिकित्सा तकनीकों और नवजात सर्जरी में हुई प्रगति के कारण गैस्ट्रोस्किसिस से पीड़ित अधिकांश बच्चों का सफल उपचार संभव है। गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच, समय पर विशेषज्ञ अस्पताल में प्रसव और जन्म के तुरंत बाद उचित उपचार मिलने से बच्चे के स्वस्थ जीवन की संभावना काफी बढ़ जाती है। हालांकि यह बीमारी दुर्लभ है, लेकिन इसके प्रति जागरूकता और समय पर चिकित्सा सहायता कई नवजातों के लिए जीवनदायी साबित हो सकती है।
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