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भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की ऐतिहासिक छलांग, विक्रम-1 की पहली उड़ान सफल

भारत ने निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। स्काईरूट एयरोस्पेस का पहला निजी ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट विक्रम-1 अपनी पहली ही उड़ान में सफल रहा और पृथ्वी की कक्षा में पहुंच गया। श्रीहरिकोटा से लॉन्च हुए इस मिशन ने भारत को निजी ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता हासिल करने वाले दुनिया के चुनिंदा देशों की सूची में शामिल कर दिया है। शुरुआती तकनीकी चुनौती के बावजूद टीम ने समय रहते समस्या का समाधान कर मिशन को सफल बनाया।

पहली ही उड़ान में विक्रम-1 ने रचा इतिहास

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में शनिवार को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि दर्ज हुई, जब स्काईरूट एयरोस्पेस का विक्रम-1 रॉकेट अपनी पहली ही ऑर्बिटल उड़ान में सफल रहा। श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किए गए इस मिशन को ‘मिशन आगमन’ नाम दिया गया था। इस सफलता के साथ भारत निजी कंपनी द्वारा विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट को सफलतापूर्वक लॉन्च करने वाले दुनिया के चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है। यह उपलब्धि भारत के तेजी से बढ़ते निजी अंतरिक्ष उद्योग की क्षमता को दर्शाती है।

35 मिनट में दूर की गई तकनीकी समस्या

लॉन्च से पहले ऑटोमैटिक सीक्वेंस के दौरान रॉकेट सिस्टम में एक छोटी तकनीकी बाधा सामने आई थी। IN-SPACe के चेयरमैन पवन के. गोयनका ने बताया कि यह समस्या मामूली थी और टीम ने तुरंत कार्रवाई करते हुए इसे ठीक कर लिया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के चेयरमैन वी. नारायणन के अनुसार, ग्राउंड सेगमेंट और ऑनबोर्ड कंप्यूटर के बीच डेटा ट्रांसफर में आई गड़बड़ी को करीब 35 मिनट में दूर कर दिया गया। इसके बाद रॉकेट ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सफल उड़ान भरी।

युवा टीम ने तैयार किया अत्याधुनिक रॉकेट

स्काईरूट एयरोस्पेस के संस्थापक और सीईओ पवन कुमार चंदना ने इस मिशन को भारत के लिए ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि यह पहली बार है जब किसी भारतीय निजी कंपनी ने खुद रॉकेट विकसित करने के साथ-साथ लॉन्च सिस्टम तैयार कर सफल ऑर्बिटल मिशन पूरा किया है। करीब 28 साल औसत उम्र वाली युवा टीम ने इस रॉकेट को तैयार किया। विक्रम-1 को आधुनिक तकनीक और कार्बन कंपोजिट सामग्री से बनाया गया है, जिससे यह हल्का और अधिक प्रभावी बनाया गया है।

450 किलोमीटर ऊंची कक्षा में पहुंचाए पेलोड

करीब 24 मीटर ऊंचे विक्रम-1 रॉकेट ने उड़ान के दौरान अपने सभी चरणों को सफलतापूर्वक पूरा किया। रॉकेट के सॉलिड प्रोपल्शन चरण के बाद ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस मॉड्यूल में लगे 3D प्रिंटेड लिक्विड इंजन ने पेलोड्स को पृथ्वी से लगभग 450 किलोमीटर ऊपर लो अर्थ ऑर्बिट में स्थापित किया। इस तकनीक की खासियत यह है कि इंजन को अंतरिक्ष में दोबारा शुरू और बंद किया जा सकता है, जिससे भविष्य के मिशनों में नई संभावनाएं खुलेंगी।

विक्रम-1 के साथ अंतरिक्ष गया खास संदेश

इस ऐतिहासिक मिशन में कई विशेष पेलोड भी भेजे गए। इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ से लिखा ‘वंदे मातरम’ संदेश वाला पोस्टकार्ड भी शामिल है। इसके अलावा स्काईरूट टीम, निवेशकों और समर्थकों के संदेश भी अंतरिक्ष की यात्रा पर गए। मिशन में बेंगलुरु की कंपनी कॉस्मॉस डायमंड्स द्वारा तैयार विशेष प्रयोगशाला निर्मित हीरा ‘डायमंड लोटस’ भी भेजा गया। यह मिशन भारत की तकनीकी क्षमता और निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की बढ़ती भूमिका का प्रतीक बन गया है।

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