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बलूचिस्तान की ‘आजादी’ के दावे से बढ़ी हलचल, क्या अलग देश बनना वास्तव में संभव है?

बलूच अलगाववादी समूहों की ओर से पाकिस्तान से अलग होकर ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ घोषित करने के दावे ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा छेड़ दी है। हालांकि, किसी संगठन द्वारा स्वतंत्रता की घोषणा कर देना और उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता मिलना दो अलग-अलग बातें हैं। फिलहाल इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत प्रशासनिक रूप से अब भी पाकिस्तान सरकार के नियंत्रण में है।

क्या वास्तव में अलग देश बन गया है बलूचिस्तान?

कुछ बलूच अलगाववादी संगठनों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित करते हुए ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ नाम अपनाने की बात कही है। साथ ही उन्होंने क्षेत्र के बड़े हिस्से पर नियंत्रण का दावा भी किया है। हालांकि, इन दावों की किसी स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है। वर्तमान स्थिति में पाकिस्तान का प्रशासनिक, सैन्य और संवैधानिक नियंत्रण बलूचिस्तान प्रांत पर कायम है। इसलिए केवल स्वतंत्रता की घोषणा से कोई क्षेत्र स्वतः एक मान्यता प्राप्त राष्ट्र नहीं बन जाता।

अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है?

किसी नए देश के गठन को लेकर अंतरराष्ट्रीय कानून में कुछ व्यापक रूप से स्वीकार किए गए सिद्धांत हैं। 1933 के मोंटेवीडियो कन्वेंशन के अनुसार किसी भी राज्य के लिए स्थायी आबादी, स्पष्ट भू-सीमा, प्रभावी सरकार और अन्य देशों से संबंध स्थापित करने की क्षमता जैसी मूल शर्तें महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। हालांकि यह कन्वेंशन सभी देशों पर बाध्यकारी नहीं है, लेकिन राज्य की मान्यता से जुड़े मामलों में इसे अक्सर संदर्भ के रूप में देखा जाता है। केवल स्वतंत्रता की घोषणा इन सभी शर्तों को स्वतः पूरा नहीं करती।

बलूचिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां

विशेषज्ञों के अनुसार यदि कोई क्षेत्र अलग राष्ट्र बनने का दावा करता है तो उसे अपने पूरे घोषित क्षेत्र पर प्रभावी प्रशासन, कानून व्यवस्था, राजस्व व्यवस्था और सार्वजनिक सेवाओं का संचालन भी साबित करना होता है। बलूचिस्तान के मामले में यह चुनौती और जटिल है क्योंकि ऐतिहासिक बलूच क्षेत्र पाकिस्तान के अलावा ईरान और अफगानिस्तान तक फैला हुआ माना जाता है। वहीं पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत उस पूरे भूभाग का केवल एक हिस्सा है। ऐसे में सीमाओं और प्रशासनिक नियंत्रण का प्रश्न सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है।

अंतरराष्ट्रीय मान्यता क्यों होती है अहम?

किसी भी नए देश के लिए अन्य देशों की मान्यता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। मान्यता मिलने के बाद ही कोई देश दूतावास खोल सकता है, अपने पासपोर्ट को अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति दिला सकता है, वैश्विक वित्तीय संस्थानों से जुड़ सकता है और अंतरराष्ट्रीय संधियों में भाग ले सकता है। यदि व्यापक मान्यता नहीं मिलती तो व्यवहारिक रूप से उस इकाई के लिए वैश्विक स्तर पर सामान्य राष्ट्र की तरह कार्य करना बेहद कठिन हो जाता है। इसलिए केवल राजनीतिक घोषणा पर्याप्त नहीं मानी जाती।

क्या संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता आसान होगी?

संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता के लिए पहले सुरक्षा परिषद की मंजूरी आवश्यक होती है। इसके बाद महासभा में मतदान होता है। सुरक्षा परिषद में कम से कम नौ सदस्यों का समर्थन और पांच स्थायी सदस्यों (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस) में से किसी का वीटो न होना जरूरी है। विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान के साथ चीन के करीबी संबंध और क्षेत्र में उसके बड़े आर्थिक निवेश को देखते हुए किसी संभावित आवेदन के सामने महत्वपूर्ण कूटनीतिक चुनौतियां आ सकती हैं। हालांकि यह पूरी तरह संभावित परिदृश्य है और किसी भविष्य के निर्णय का पूर्वानुमान नहीं माना जा सकता।

भारत और दुनिया का रुख क्या होगा?

अब तक भारत सहित किसी प्रमुख देश ने बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी है। किसी नए राज्य को मान्यता देना प्रत्येक देश का संप्रभु और कूटनीतिक निर्णय होता है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून, क्षेत्रीय स्थिरता और विदेश नीति जैसे कई कारकों पर आधारित होता है। फिलहाल उपलब्ध स्थिति यही है कि बलूचिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान का हिस्सा माना जाता है और इस स्थिति में किसी आधिकारिक बदलाव की घोषणा नहीं हुई है।

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