ईरान के पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनेजाद को लेकर सनसनीखेज दावे, कथित मोसाद संपर्कों की रिपोर्ट से मचा बवाल
ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सामने आई एक रिपोर्ट ने नई राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद ने कई वर्षों तक उनसे संपर्क बनाए रखने और उन्हें भविष्य की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनाने की कोशिश की। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों की ओर से भी कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
रिपोर्ट में क्या किए गए हैं दावे?
अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, महमूद अहमदीनेजाद को लेकर दावा किया गया है कि वर्ष 2022 से उनके और इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद के बीच कथित संपर्क स्थापित करने की कोशिशें चल रही थीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस रणनीति का उद्देश्य भविष्य में ईरान की राजनीति में उनकी संभावित वापसी की संभावनाओं को तलाशना था। हालांकि इन आरोपों के समर्थन में कोई सार्वजनिक आधिकारिक दस्तावेज या स्वतंत्र प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए इन दावों को फिलहाल सत्यापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
बुडापेस्ट बैठक को लेकर भी सामने आए दावे
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि वर्ष 2024 में हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में आयोजित एक सम्मेलन के दौरान अहमदीनेजाद की कथित तौर पर इजरायली अधिकारियों से मुलाकात कराने की योजना बनाई गई थी। बताया गया कि सम्मेलन इस मुलाकात के लिए एक माध्यम बनाया गया। हालांकि हंगरी, इजरायल या ईरान की सरकार की ओर से इस कथित बैठक की पुष्टि नहीं की गई है। इसलिए इस जानकारी को भी केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर देखा जाना चाहिए।
नजरबंदी और राजनीतिक गतिविधियों पर अटकलें
कुछ रिपोर्टों में यह दावा भी किया गया है कि ईरानी सुरक्षा एजेंसियों ने अहमदीनेजाद को कथित विदेशी संपर्कों के संदेह में नजरबंद किया। वहीं यह भी कहा गया कि उन्होंने हाल के राष्ट्रपति चुनाव में फिर से सक्रिय होने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिली। इन दावों की भी ईरानी अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक रूप से पुष्टि नहीं की गई है। ऐसे में इन खबरों को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है।
क्षेत्रीय तनाव के बीच बढ़ी अटकलें
ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी तनाव के माहौल में इस तरह की रिपोर्टों ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों में खुफिया गतिविधियों और राजनीतिक दावों से जुड़ी खबरों की स्वतंत्र पुष्टि बेहद जरूरी होती है। जब तक संबंधित सरकारें या विश्वसनीय आधिकारिक संस्थाएं इन आरोपों की पुष्टि नहीं करतीं, तब तक इन्हें स्थापित तथ्य के बजाय अपुष्ट दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।