राजस्थान में प्रसूताओं की मौतों पर सरकार अलर्ट, स्वास्थ्य मंत्री ने बताई वजहें और दिए सख्त निर्देश
राजस्थान के विभिन्न सरकारी अस्पतालों में हाल के दिनों में प्रसूताओं की मौत के मामलों ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बढ़ती चिंताओं के बीच चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने वरिष्ठ स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों के साथ उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की। बैठक में मातृ मृत्यु के कारणों की समीक्षा की गई और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए गए।
मातृ मृत्यु के कारणों पर सरकार की समीक्षा
जयपुर स्थित स्वास्थ्य भवन में आयोजित बैठक में स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने कहा कि हालिया मामलों की समीक्षा में अधिकांश प्रसूताओं की मौत के पीछे गंभीर एनीमिया (खून की कमी), उच्च रक्तचाप, प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव (PPH) और कुपोषण जैसे कारण सामने आए हैं। उनके अनुसार अधिकांश महिलाएं ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे अस्पतालों से गंभीर हालत में रेफर होकर बड़े मेडिकल कॉलेजों तक पहुंची थीं, जहां चिकित्सकों ने उन्हें बचाने का प्रयास किया, लेकिन कई मामलों में स्थिति अत्यधिक गंभीर थी।
मातृ मृत्यु दर में कमी का सरकार का दावा
बैठक में स्वास्थ्य विभाग ने मातृ मृत्यु दर से जुड़े आंकड़े भी प्रस्तुत किए। सरकार के अनुसार वर्ष 2023-24 में राज्य में 1,094 मातृ मृत्यु के मामले दर्ज हुए थे, जो 2024-25 में घटकर 986 रह गए। वहीं 2025-26 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार यह संख्या 824 तक पहुंच गई है। स्वास्थ्य मंत्री ने दावा किया कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में मातृ मृत्यु दर में लगभग 25 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। हालांकि उन्होंने माना कि हाल की घटनाएं गंभीर हैं और प्रत्येक मामले की विस्तृत जांच कराई जा रही है।
हर मामले का होगा मेडिकल ऑडिट
स्वास्थ्य मंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कोटा, बीकानेर, भीलवाड़ा और बांसवाड़ा के मेडिकल कॉलेजों के अधिकारियों से चर्चा की। उन्होंने हाल ही में हुई प्रत्येक मातृ मृत्यु की केस हिस्ट्री और मेडिकल ऑडिट रिपोर्ट की समीक्षा करने के निर्देश दिए। साथ ही अस्पतालों में संक्रमण रोकने, निर्धारित चिकित्सा प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन करने और मरीजों को समय पर बेहतर उपचार उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया गया।
प्राथमिक स्तर पर मजबूत होगी स्वास्थ्य व्यवस्था
बैठक में बड़े मेडिकल कॉलेजों के विशेषज्ञों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) के चिकित्सकों का मार्गदर्शन करने के निर्देश दिए गए। सरकार का लक्ष्य है कि हाई-रिस्क गर्भावस्था की पहचान शुरुआती स्तर पर ही हो जाए ताकि समय रहते उचित उपचार शुरू किया जा सके और गंभीर मरीजों को बेहतर तरीके से रेफर किया जा सके। इससे बड़े अस्पतालों पर दबाव कम होने की भी उम्मीद है।
आशा-एएनएम की निगरानी और विशेषज्ञों के सुझाव
स्वास्थ्य मंत्री ने वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञों को ग्रामीण क्षेत्रों में आशा सहयोगिनियों और एएनएम द्वारा की जा रही प्रसव पूर्व जांच (ANC) की निगरानी करने के निर्देश दिए। बैठक में विशेषज्ञों ने बड़े अस्पतालों में अलग ऑब्सटेट्रिक आईसीयू स्थापित करने, लेबर रूम को आधुनिक बनाने, गंभीर एनीमिया का प्राथमिक स्तर पर इलाज सुनिश्चित करने, ऑपरेशन से पहले आवश्यक जांच अनिवार्य करने और प्रत्येक अस्पताल में रेफरल रजिस्टर बनाए रखने जैसे सुझाव भी दिए। सरकार ने इन सुझावों पर गंभीरता से विचार करने का आश्वासन दिया।