कश्मीर मुद्दे पर UN का रास्ता अपनाने की सलाह, पाकिस्तानी विशेषज्ञ ने अनुच्छेद 96 का दिया हवाला
कश्मीर मुद्दे को फिर से अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की रणनीति को लेकर पाकिस्तान में नई बहस शुरू हो गई है। हार्वर्ड से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ हसन असलम शाद ने सुझाव दिया है कि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 96 का सहारा लेकर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) से सलाहकारी राय (Advisory Opinion) मांगने की पहल करे। उनका मानना है कि इससे कानूनी और कूटनीतिक स्तर पर कश्मीर को लेकर वैश्विक विमर्श प्रभावित किया जा सकता है। हालांकि यह विशेषज्ञ की व्यक्तिगत राय है और ऐसी किसी पहल पर संयुक्त राष्ट्र या ICJ की ओर से कोई निर्णय नहीं हुआ है।
डॉन में प्रकाशित लेख में रखी कानूनी रणनीति की दलील
पाकिस्तानी अखबार डॉन में प्रकाशित अपने लेख में हसन असलम शाद ने दावा किया कि हाल के अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के बाद पाकिस्तान के लिए अपनी विदेश नीति और कानूनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करने का अवसर है। उन्होंने कहा कि कश्मीर के मुद्दे पर अब तक पाकिस्तान की रणनीति अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सकी है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कानून के उपलब्ध प्रावधानों का अधिक सक्रिय उपयोग किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए वैश्विक जनमत को प्रभावित करने की कोशिश भविष्य की कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा बन सकती है।
क्या है संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 96?
विशेषज्ञ ने अपने लेख में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 96 का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके तहत संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) से किसी कानूनी प्रश्न पर सलाहकारी राय मांग सकती है। ऐसी राय बाध्यकारी (Binding) नहीं होती, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति में उसका महत्व माना जाता है। उन्होंने तर्क दिया कि इस प्रक्रिया के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्वीकृति या वीटो की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए इसे एक संभावित कानूनी विकल्प के रूप में देखा जा सकता है।
चागोस द्वीप मामले का दिया उदाहरण
हसन असलम शाद ने अपनी दलील के समर्थन में चागोस द्वीप विवाद का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2019 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ICJ से इस मामले में सलाहकारी राय मांगी थी। यद्यपि वह राय कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं थी, लेकिन उसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हुई और ब्रिटेन पर कूटनीतिक दबाव बढ़ा। विशेषज्ञ का तर्क है कि इसी प्रकार की कानूनी प्रक्रिया कश्मीर मुद्दे पर भी वैश्विक चर्चा को नई दिशा दे सकती है।
भारत के संभावित रुख का भी किया उल्लेख
अपने लेख में हसन असलम शाद ने माना कि भारत ऐसी किसी भी पहल का कड़ा विरोध करेगा। उन्होंने लिखा कि भारत लंबे समय से कश्मीर को द्विपक्षीय विषय मानता रहा है और यही उसका आधिकारिक रुख भी है। दूसरी ओर, उन्होंने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पुराने प्रस्तावों का हवाला देकर अपने पक्ष को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखने की कोशिश कर सकता है। हालांकि भारत लगातार यह कहता रहा है कि जम्मू-कश्मीर उसका अभिन्न अंग है और इससे जुड़े सभी मुद्दे भारत-पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय स्तर पर ही सुलझाए जाने चाहिए।
विशेषज्ञ बोले- उद्देश्य तत्काल समाधान नहीं, वैश्विक विमर्श बदलना
लेख में हसन असलम शाद ने स्पष्ट किया कि यदि ICJ से सलाहकारी राय भी मिलती है तो इससे कश्मीर विवाद का तत्काल समाधान नहीं होगा। उनके अनुसार, इस रणनीति का उद्देश्य कानूनी और कूटनीतिक माहौल को प्रभावित करना तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस विषय पर नए सिरे से चर्चा शुरू कराना है। उन्होंने दावा किया कि यदि अनुकूल सलाहकारी राय आती है तो विभिन्न देशों के लिए अपने रुख की समीक्षा करने का आधार बन सकता है। हालांकि यह पूरी तरह लेखक का विश्लेषण और सुझाव है, जिस पर किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था की आधिकारिक मुहर नहीं है।