#देश दुनिया

सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की वैश्विक मुहिम क्यों पड़ रही फीकी? भारत के रुख को मिल रही कानूनी मजबूती

सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहा है। भारत द्वारा संधि को निलंबित रखने के फैसले के बाद पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसे प्रमुख मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि कानूनी और कूटनीतिक आधार पर पाकिस्तान की दलीलों को व्यापक समर्थन मिलने की संभावना सीमित है। उनका कहना है कि यह विवाद केवल जल बंटवारे का नहीं, बल्कि दोनों देशों के आपसी विश्वास और सुरक्षा परिस्थितियों से भी जुड़ा हुआ है।

पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बढ़ा रहा दबाव

भारत के फैसले के बाद पाकिस्तान लगातार यह दावा कर रहा है कि पानी को राजनीतिक और रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इस मुद्दे को जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय संकट और जल सुरक्षा जैसे वैश्विक विषयों से जोड़कर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की जा रही है। पाकिस्तान का तर्क है कि यदि जल प्रवाह प्रभावित होता है तो उसका असर कृषि, खाद्य सुरक्षा और आम नागरिकों के जीवन पर पड़ेगा। इसी आधार पर वह विभिन्न वैश्विक मंचों पर सहानुभूति जुटाने की रणनीति अपना रहा है।

‘पीड़ित राष्ट्र’ की छवि बनाने की पुरानी रणनीति

विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान लंबे समय से खुद को निचले प्रवाह वाले देश (Lower Riparian State) के रूप में पेश करता रहा है। इतिहास में भी उसने संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर पानी के मुद्दे को उठाकर भारत पर दबाव बनाने का प्रयास किया था। 1950 के दशक में भी पाकिस्तान ने दावा किया था कि भारत द्वारा जल प्रवाह प्रभावित किए जाने से उसकी कृषि को नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि वर्तमान परिस्थिति में अंतरराष्ट्रीय समुदाय केवल भावनात्मक दलीलों के बजाय संधियों के कानूनी प्रावधानों और वास्तविक तथ्यों को अधिक महत्व दे रहा है।

संधि के कानूनी प्रावधानों पर टिकी है पूरी बहस

विशेषज्ञों का कहना है कि सिंधु जल संधि का मूल उद्देश्य दोनों देशों के बीच नदी जल के उपयोग को स्पष्ट नियमों के तहत संचालित करना है। संधि भारत की क्षेत्रीय संप्रभुता को समाप्त नहीं करती, बल्कि जल उपयोग से जुड़े अधिकारों और दायित्वों को निर्धारित करती है। इसी कारण कई विशेषज्ञ मानते हैं कि संधि के प्रावधानों की व्याख्या केवल राजनीतिक बयानबाजी के आधार पर नहीं, बल्कि उसके वास्तविक कानूनी स्वरूप के अनुसार की जानी चाहिए। यही वजह है कि पाकिस्तान की कई दलीलों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतः स्वीकार किए जाने की संभावना कम मानी जा रही है।

सुरक्षा और आतंकवाद भी बने अहम मुद्दे

भारत का रुख यह रहा है कि दोनों देशों के बीच किसी भी दीर्घकालिक समझौते का आधार आपसी विश्वास और शांतिपूर्ण संबंध होने चाहिए। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सीमा पार आतंकवाद और द्विपक्षीय तनाव जारी रहते हैं, तो पुराने सहयोगात्मक ढांचे को पहले की तरह बनाए रखना कठिन हो जाता है। इसी संदर्भ में भारत का कहना है कि वर्तमान परिस्थितियों में संधि की समीक्षा या उसके निलंबन को व्यापक सुरक्षा परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।

आगे क्या हो सकता है?

विश्लेषकों के अनुसार, सिंधु जल संधि दुनिया के सबसे लंबे समय तक प्रभावी रहे सीमा-पार जल समझौतों में गिनी जाती है। लेकिन किसी भी ऐसे समझौते की सफलता दोनों पक्षों के सहयोग और विश्वास पर निर्भर करती है। आने वाले समय में यह मुद्दा द्विपक्षीय वार्ता, अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रियाओं और क्षेत्रीय कूटनीति के जरिए आगे बढ़ सकता है। फिलहाल दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए इस विषय पर निकट भविष्य में समाधान आसान दिखाई नहीं देता।

author avatar
stvnewsonline@gmail.com

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *