IWT विवाद: सिंधु संधि और ब्रह्मपुत्र पर बढ़ी कूटनीतिक बहस, जयशंकर के बयान की रॉबर्ट कियोसाकी ने की सराहना
सिंधु जल संधि (IWT) और ब्रह्मपुत्र नदी को लेकर भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच बढ़ी कूटनीतिक चर्चा पर अमेरिकी निवेशक एवं लेखक रॉबर्ट कियोसाकी ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के हालिया बयान को रणनीतिक संदेश बताते हुए इसकी सराहना की। हालांकि, कियोसाकी की यह टिप्पणी उनका व्यक्तिगत विश्लेषण है, न कि किसी सरकार का आधिकारिक आकलन।
पानी के मुद्दे पर बढ़ी भू-राजनीतिक चर्चा
भारत द्वारा सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को निलंबित करने के फैसले के बाद दक्षिण एशिया में जल संसाधनों को लेकर कूटनीतिक बहस तेज हो गई है। इसी बीच अमेरिकी निवेशक और ‘रिच डैड पुअर डैड’ के लेखक रॉबर्ट कियोसाकी ने सोशल मीडिया पर इस पूरे घटनाक्रम का अपना विश्लेषण साझा किया। उन्होंने कहा कि आधुनिक दौर में पानी, ऊर्जा और समुद्री व्यापार मार्ग केवल संसाधन नहीं, बल्कि रणनीतिक शक्ति का भी हिस्सा बन चुके हैं। उनके अनुसार, भारत की प्रतिक्रिया प्रत्यक्ष टकराव के बजाय कूटनीतिक संकेतों के जरिए दी गई, जिसे उन्होंने आधुनिक भू-राजनीतिक रणनीति का उदाहरण बताया।
चीन के संकेत और ब्रह्मपुत्र को लेकर उठी बहस
कियोसाकी ने अपने विश्लेषण में चीन के एक वरिष्ठ नीति विशेषज्ञ के उस बयान का उल्लेख किया, जिसमें ब्रह्मपुत्र नदी के जल प्रवाह का संदर्भ दिया गया था। ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत से निकलकर भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम होते हुए बांग्लादेश पहुंचती है। चीन के ऊपरी हिस्से में प्रस्तावित जल परियोजनाओं और बांधों को लेकर पहले भी भारत अपनी चिंताएं जता चुका है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्मपुत्र का अधिकांश जल भारत में मानसूनी वर्षा और सहायक नदियों से आता है, इसलिए केवल ऊपरी हिस्से का नियंत्रण पूरे नदी तंत्र को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जाता।
जयशंकर के बयान को रणनीतिक संदेश के रूप में देखा गया
रॉबर्ट कियोसाकी ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के एक कूटनीतिक मंच पर दिए गए बयान का भी उल्लेख किया। जयशंकर ने बिना किसी देश का नाम लिए कहा था कि जो देश अपनी ऊर्जा आपूर्ति के लिए समुद्री व्यापार मार्गों पर निर्भर हैं, उन्हें अपने रणनीतिक संबंधों का आकलन गंभीरता से करना चाहिए। कियोसाकी ने इसे मलक्का जलडमरूमध्य की ओर संकेत बताया, जो वैश्विक समुद्री व्यापार और चीन के ऊर्जा आयात के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है। हालांकि, जयशंकर ने अपने बयान में किसी देश या क्षेत्र का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं किया था।
ब्रह्मपुत्र और ग्रेट बेंड डैम पर क्यों बढ़ी चिंता?
चीन तिब्बत क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र नदी पर बड़े जलविद्युत परियोजना और ग्रेट बेंड डैम के निर्माण की दिशा में काम कर रहा है। इस परियोजना को लेकर भारत और बांग्लादेश पहले भी पर्यावरणीय और जल प्रवाह से जुड़ी चिंताएं व्यक्त कर चुके हैं। कियोसाकी का मानना है कि भविष्य में जल संसाधन भी अंतरराष्ट्रीय रणनीति का अहम हिस्सा बन सकते हैं। हालांकि, जल विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी नदी के प्रवाह को पूरी तरह नियंत्रित करना तकनीकी और भौगोलिक रूप से बेहद जटिल प्रक्रिया है तथा इससे जुड़े प्रभाव कई प्राकृतिक कारकों पर भी निर्भर करते हैं।
जल, ऊर्जा और समुद्री मार्ग बन रहे नई रणनीति का केंद्र
विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में जल सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्ग किसी भी देश की रणनीतिक नीति के प्रमुख आधार बन चुके हैं। भारत, चीन और पाकिस्तान के बीच जल संसाधनों को लेकर बढ़ती चर्चा भी इसी व्यापक भू-राजनीतिक परिदृश्य का हिस्सा मानी जा रही है। आने वाले समय में सिंधु जल संधि, ब्रह्मपुत्र परियोजनाओं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।