जोधपुर में चौंकाने वाला मामला: शादीशुदा बेटी को ससुराल से ले गया पिता, दूसरी जगह कराई शादी
डेढ़ साल बाद बेटी को वापस ले गया पिता, पति ने दर्ज कराया केस
राजस्थान के जोधपुर जिले से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि एक पिता अपनी शादीशुदा बेटी को विवाह के करीब डेढ़ साल बाद उसके ससुराल से वापस ले गया और बाद में उसकी दूसरी जगह शादी करा दी। इस मामले में महिला के पति ने न्यायालय के आदेश के बाद अपने ससुर समेत 17 लोगों के खिलाफ प्रतापनगर थाने में मामला दर्ज कराया है। पुलिस पूरे प्रकरण की जांच कर रही है।
‘आटा-साटा’ और 15 लाख रुपये की मांग का आरोप
प्रतापनगर थाना पुलिस के अनुसार, पीड़ित पति अरुण (रिपोर्ट के अनुसार) ने न्यायालय में पेश इस्तगासे में बताया कि उसका विवाह नवंबर 2023 में लीला से हुआ था। शादी के बाद करीब डेढ़ वर्ष तक दांपत्य जीवन सामान्य रहा। शिकायत में कहा गया है कि विवाह के समय किसी प्रकार की कोई शर्त नहीं रखी गई थी, लेकिन बाद में उसके ससुर पोकरराम ने अपने बेटे की शादी कराने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया।
शिकायत के मुताबिक, जुलाई 2025 में पोकरराम और अन्य लोग अरुण के घर पहुंचे और कथित तौर पर ‘आटा-साटा’ प्रथा के तहत लड़की देने या 15 लाख रुपये देने की मांग की। आरोप है कि मांग पूरी नहीं होने पर वे लीला को अपने साथ ले गए और कहा कि या तो 15 लाख रुपये लेकर आना या फिर ‘आटा-साटा’ की शर्त पूरी करना, अन्यथा बहू को भूल जाना।
दूसरी जगह शादी कराने का आरोप
पीड़ित पति का आरोप है कि पत्नी के मायके जाने के बाद उसने और उसके परिवार ने कई बार ससुराल पक्ष से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। बाद में फरवरी 2026 में उसे जानकारी मिली कि उसकी पत्नी का विवाह किसी अन्य व्यक्ति, मुकेश, से करा दिया गया है। इसके बाद उसने पुलिस में शिकायत दी, लेकिन मामला दर्ज नहीं होने पर न्यायालय की शरण ली। अदालत के आदेश के बाद पुलिस ने ससुर सहित 17 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
हाईकोर्ट पहले भी जता चुका है सख्त रुख
गौरतलब है कि इस वर्ष मई में राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान ‘आटा-साटा’ प्रथा पर कड़ी टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा था कि बेटियों को वैवाहिक सौदेबाजी का माध्यम नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी बेटी को दूसरे परिवार के बेटे की शादी की गारंटी मानना अस्वीकार्य है और ऐसी प्रथाएं बच्चों तथा महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करती हैं। अदालत ने कहा था कि सामाजिक दबाव में दी गई सहमति को स्वतंत्र सहमति नहीं माना जा सकता और ऐसी परंपराओं को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।