बुखार के साथ दिखें ये 7 संकेत तो न करें लापरवाही, हो सकता है जानलेवा Septic Shock
बुखार को अक्सर सामान्य वायरल संक्रमण मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन अगर इसके साथ सांस लेने में दिक्कत, भ्रम, तेज धड़कन या पेशाब कम आने जैसे लक्षण भी दिखाई दें, तो यह गंभीर संक्रमण का संकेत हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी स्थिति में सेप्सिस और सेप्टिक शॉक का खतरा बढ़ जाता है, जो समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा साबित हो सकता है। इसलिए इन चेतावनी संकेतों को पहचानना और तुरंत अस्पताल पहुंचना बेहद जरूरी है।
क्या होता है सेप्टिक शॉक और क्यों है इतना खतरनाक?
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन (NLM) के अनुसार, जब शरीर किसी बैक्टीरिया, वायरस, फंगस या अन्य संक्रमण से लड़ते समय जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया देने लगता है, तो पूरे शरीर में सूजन फैल सकती है। इस स्थिति को सेप्सिस कहा जाता है। अगर संक्रमण के कारण ब्लड प्रेशर खतरनाक स्तर तक गिर जाए और दवाओं के बावजूद सामान्य न हो, तो इसे सेप्टिक शॉक कहा जाता है। इससे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों जैसे दिल, किडनी, फेफड़े और मस्तिष्क तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, जिससे मरीज की जान पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। यही वजह है कि इसे मेडिकल इमरजेंसी माना जाता है।
बुखार के साथ दिखें ये 7 चेतावनी संकेत
सामान्य बुखार और गंभीर संक्रमण के बीच फर्क समझना बेहद जरूरी है। अगर तेज बुखार के साथ सांस तेजी से चलने लगे, दिल की धड़कन असामान्य रूप से बढ़ जाए, अत्यधिक कमजोरी महसूस हो, मरीज भ्रमित रहने लगे या सवालों का जवाब देने में कठिनाई हो, पेशाब की मात्रा कम हो जाए और त्वचा ठंडी, पीली या धब्बेदार दिखाई देने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि ये लक्षण शरीर में संक्रमण के तेजी से फैलने और अंगों पर असर पड़ने की ओर इशारा कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में बिना देरी किए अस्पताल पहुंचना सबसे सुरक्षित विकल्प है।
किन लोगों में सबसे ज्यादा रहता है खतरा?
हर व्यक्ति में सेप्सिस का जोखिम समान नहीं होता। 65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग, नवजात और छोटे बच्चे, डायबिटीज, कैंसर या किडनी रोग से पीड़ित मरीज, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोग और ICU में भर्ती मरीज इस खतरे की श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा बड़ी सर्जरी, गंभीर चोट, निमोनिया, यूरिन इंफेक्शन, त्वचा या पेट के गंभीर संक्रमण से जूझ रहे मरीजों में भी सेप्टिक शॉक का जोखिम अधिक होता है। ऐसे लोगों में संक्रमण के शुरुआती लक्षण दिखते ही चिकित्सकीय सलाह लेना बेहद आवश्यक माना जाता है।
किन संक्रमणों से बढ़ सकता है सेप्सिस का खतरा?
विशेषज्ञों के अनुसार, सेप्सिस कोई अलग बीमारी नहीं बल्कि किसी गंभीर संक्रमण की जटिल प्रतिक्रिया है। फेफड़ों का संक्रमण (निमोनिया), यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI), पेट का संक्रमण, त्वचा के संक्रमित घाव और सर्जरी के बाद होने वाला संक्रमण इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं। यदि इन संक्रमणों का समय पर इलाज नहीं किया जाए तो बैक्टीरिया या अन्य रोगाणु पूरे शरीर में फैल सकते हैं और स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है। इसलिए संक्रमण के शुरुआती लक्षणों को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है।
अस्पताल में कैसे किया जाता है इलाज?
डॉक्टरों को जब सेप्सिस या सेप्टिक शॉक का संदेह होता है तो इलाज में देरी नहीं की जाती। मरीज के ब्लड टेस्ट और अन्य जांचों के जरिए संक्रमण की वजह का पता लगाया जाता है। इसके बाद नस के जरिए तरल पदार्थ (IV Fluids), एंटीबायोटिक्स और जरूरत पड़ने पर ब्लड प्रेशर नियंत्रित रखने वाली दवाएं दी जाती हैं। कई मामलों में ऑक्सीजन सपोर्ट या वेंटिलेटर की जरूरत भी पड़ सकती है। गंभीर मरीजों को ICU में भर्ती कर लगातार निगरानी में रखा जाता है ताकि अंगों को नुकसान से बचाया जा सके।
कैसे करें बचाव और कब तुरंत अस्पताल जाएं?
हर संक्रमण सेप्टिक शॉक में नहीं बदलता, लेकिन समय पर इलाज से इसका खतरा काफी कम किया जा सकता है। डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाएं लेना, घावों को साफ रखना, टीकाकरण समय पर करवाना और डायबिटीज जैसी बीमारियों को नियंत्रित रखना बचाव के अहम उपाय हैं। यदि बुखार के साथ सांस लेने में परेशानी, भ्रम, बेहोशी, पेशाब कम आना, त्वचा ठंडी पड़ना या अत्यधिक कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो घरेलू इलाज या इंतजार करने की बजाय तुरंत अस्पताल की इमरजेंसी सेवा लेना चाहिए। समय पर इलाज ही इस जानलेवा स्थिति से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।