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करौली पॉक्सो केस: डीएनए रिपोर्ट बनी अहम साक्ष्य, अदालत ने सुनाई 20 साल की सजा

राजस्थान के करौली जिले में पॉक्सो मामलों की विशेष अदालत ने नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में अहम फैसला सुनाया है। मामले में फॉरेंसिक डीएनए जांच को महत्वपूर्ण साक्ष्य मानते हुए अदालत ने नाबालिग आरोपी को 20 वर्ष के कारावास और आर्थिक दंड की सजा सुनाई। साथ ही पीड़िता को प्रतिकर योजना के तहत आर्थिक सहायता देने के निर्देश भी दिए गए।

दुष्कर्म के आरोप के बाद दर्ज हुआ मामला

अभियोजन पक्ष के अनुसार, मामला महावीरजी थाना क्षेत्र का है। शिकायत में आरोप लगाया गया कि नाबालिग पीड़िता को बहाने से घर बुलाकर उसके साथ दुष्कर्म किया गया। आरोप है कि घटना के दौरान पीड़िता को धमकाया गया, जिसके कारण उसने लंबे समय तक किसी को घटना की जानकारी नहीं दी। बाद में गर्भ ठहरने पर मामला सामने आया और पुलिस ने संबंधित धाराओं में केस दर्ज कर जांच शुरू की।

डीएनए जांच बनी सबसे अहम साक्ष्य

जांच के दौरान गर्भपात के बाद सुरक्षित रखे गए भ्रूण के नमूने और आरोपी के रक्त के नमूनों की फॉरेंसिक डीएनए जांच कराई गई। अभियोजन के अनुसार, डीएनए रिपोर्ट में जैविक संबंध की पुष्टि हुई, जिसे अदालत ने महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया। सुनवाई के दौरान 21 गवाहों के बयान और 43 दस्तावेजी साक्ष्य भी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए।

20 साल की सजा और 1.02 लाख रुपये का जुर्माना

पॉक्सो मामलों की विशेष अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने उस पर 1 लाख 2 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया। साथ ही राज्य की पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत पीड़िता को 5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान करने के निर्देश दिए।

वैज्ञानिक साक्ष्यों की भूमिका पर जोर

इस मामले में डीएनए फॉरेंसिक रिपोर्ट ने जांच और अभियोजन को मजबूत आधार प्रदान किया। अदालत के फैसले में वैज्ञानिक साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को महत्वपूर्ण माना गया। अधिकारियों का कहना है कि संवेदनशील मामलों में वैज्ञानिक जांच अपराध की सच्चाई सामने लाने और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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