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अटलांटिक का ‘कोल्ड ब्लॉब’ बदल रहा भारत का मानसून, करोड़ों लोगों पर बढ़ा खतरा

उत्तरी अटलांटिक महासागर में मौजूद असामान्य रूप से ठंडे पानी का क्षेत्र, जिसे ‘कोल्ड ब्लॉब’ कहा जाता है, अब दक्षिण एशिया के मौसम पर असर डालता दिखाई दे रहा है। नई रिसर्च में दावा किया गया है कि इस बदलाव की वजह से भारत और पाकिस्तान में मानसून का पैटर्न बदल रहा है, जिससे खेती, जल संसाधनों और करोड़ों लोगों की आजीविका पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

क्या है अटलांटिक का कोल्ड ब्लॉब?

कोल्ड ब्लॉब, जिसे नॉर्थ अटलांटिक वार्मिंग होल भी कहा जाता है, ग्रीनलैंड के दक्षिण में स्थित महासागर का एक ऐसा हिस्सा है जहां समुद्र का तापमान आसपास के क्षेत्रों की तुलना में कम बना हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि जब दुनिया के अधिकांश हिस्सों में तापमान बढ़ रहा है, तब यह क्षेत्र लगातार ठंडा हो रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह असामान्य स्थिति वैश्विक जलवायु प्रणाली को प्रभावित कर रही है।

नई रिसर्च में सामने आया मानसून से संबंध

विशेषज्ञों के अनुसार, कोल्ड ब्लॉब और भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून के बीच एक नया संबंध सामने आया है। शोध में पाया गया कि 1999 के बाद मानसून के पैटर्न में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिले हैं। उत्तर-पश्चिम भारत में पहले की तुलना में अधिक बारिश दर्ज की जा रही है, जबकि इंडो-गैंगेटिक क्षेत्र में वर्षा में कमी देखी गई है। इससे पारंपरिक कृषि व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

किसानों और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है असर

जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि बारिश के बदलते पैटर्न का सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ सकता है। जिन क्षेत्रों में पहले अपेक्षाकृत कम बारिश होती थी, वहां अत्यधिक वर्षा फसलों को नुकसान पहुंचा सकती है। वहीं जिन इलाकों में सामान्य रूप से अच्छी बारिश होती थी, वहां वर्षा में कमी उत्पादन पर असर डाल सकती है। इससे खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

AMOC और वैश्विक जलवायु बदलाव से जुड़ा मामला

वैज्ञानिक इस बदलाव को अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) से भी जोड़कर देख रहे हैं। यह समुद्री धाराओं का एक महत्वपूर्ण तंत्र है, जो दुनिया के विभिन्न हिस्सों में गर्मी के वितरण को नियंत्रित करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण इस तंत्र की गति धीमी हो रही है, जिसका असर मानसून समेत कई वैश्विक मौसम प्रणालियों पर पड़ सकता है।

मौसम पूर्वानुमान के लिए नई जानकारी अहम

शोधकर्ताओं का कहना है कि कोल्ड ब्लॉब और मानसून के बीच मिले इस संबंध से भविष्य में मौसम के अधिक सटीक पूर्वानुमान लगाने में मदद मिल सकती है। साथ ही यह समझने में भी सहायता मिलेगी कि दुनिया के एक हिस्से में होने वाले जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हजारों किलोमीटर दूर दूसरे क्षेत्रों पर किस तरह पड़ता है।

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