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इस्लामपुर नाम बचाने की लड़ाई में 22 किमी पैदल चले राजेंद्र गुढ़ा, प्रदर्शन के दौरान बिगड़ी तबीयत

झुंझुनूं जिले के इस्लामपुर गांव का नाम बदलने के प्रस्ताव को लेकर विरोध तेज होता जा रहा है। गांव का नाम यथावत रखने की मांग के समर्थन में पूर्व मंत्री राजेंद्र गुढ़ा ग्रामीणों के साथ 22 किलोमीटर लंबी पदयात्रा कर जिला मुख्यालय पहुंचे। कलक्ट्रेट के बाहर आयोजित प्रदर्शन के दौरान तेज गर्मी और धूप के कारण उनकी तबीयत बिगड़ गई और वे बेहोश होकर सड़क पर गिर पड़े। इस घटना ने आंदोलन को और चर्चा में ला दिया है।

गांव के नाम परिवर्तन के विरोध में निकाली पदयात्रा

पूर्व मंत्री राजेंद्र गुढ़ा ने इस्लामपुर गांव का नाम बदलने के प्रस्ताव के विरोध में ग्रामीणों के साथ लंबी पदयात्रा की। सुबह शुरू हुई यात्रा कई गांवों से गुजरते हुए झुंझुनूं जिला मुख्यालय पहुंची। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि गांव की ऐतिहासिक पहचान और सामाजिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए नाम परिवर्तन का प्रस्ताव वापस लिया जाना चाहिए। बड़ी संख्या में ग्रामीणों और सर्व समाज के प्रतिनिधियों ने इस आंदोलन में भाग लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की।

कलक्ट्रेट के बाहर प्रदर्शन के दौरान बिगड़ी तबीयत

कलक्ट्रेट पहुंचने के बाद प्रदर्शन जारी था, तभी तेज धूप और गर्मी के कारण राजेंद्र गुढ़ा की तबीयत अचानक बिगड़ गई। वे बेहोश होकर सड़क पर गिर पड़े, जिससे मौके पर मौजूद लोगों में अफरा-तफरी मच गई। कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने तुरंत उन्हें संभाला, पानी पिलाया और तौलियों से हवा कर राहत पहुंचाने का प्रयास किया। हालांकि स्थिति सामान्य होने के बाद भी गुढ़ा ने अस्पताल जाने से इनकार कर दिया और आंदोलन स्थल पर ही डटे रहे।

प्रशासन पर लगाए सुविधाएं नहीं देने के आरोप

राजेंद्र गुढ़ा ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने प्रदर्शन स्थल पर टेंट या अन्य छाया की व्यवस्था की अनुमति नहीं दी। उनका कहना था कि भीषण गर्मी के बावजूद प्रदर्शनकारियों को खुले आसमान के नीचे बैठने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने कहा कि जब उनके समर्थक धूप में संघर्ष कर रहे हैं तो वे स्वयं किसी विशेष सुविधा का लाभ नहीं ले सकते। गुढ़ा ने इसे लोकतांत्रिक विरोध की अनदेखी बताते हुए प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाए।

चार सौ साल पुरानी पहचान बचाने की मांग

आंदोलनकारियों का कहना है कि इस्लामपुर गांव की स्थापना वर्ष 1622 में हुई थी और तब से गांव इसी नाम से जाना जाता है। गांव की आबादी लगभग 16 हजार है, जहां विभिन्न समुदाय वर्षों से आपसी भाईचारे के साथ रहते आए हैं। ग्रामीणों का तर्क है कि राजस्व रिकॉर्ड, सरकारी दस्तावेज, शैक्षणिक प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, राशन कार्ड और अन्य सभी रिकॉर्ड इसी नाम से जुड़े हुए हैं। ऐसे में नाम बदलने से लोगों को प्रशासनिक और सामाजिक दोनों तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

कांग्रेस नेताओं को सौंपा गया ज्ञापन

इस मुद्दे को लेकर गांव के प्रतिनिधिमंडल ने जयपुर पहुंचकर कांग्रेस नेताओं से भी मुलाकात की। प्रतिनिधियों ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा तथा अन्य नेताओं को ज्ञापन सौंपकर नाम परिवर्तन के प्रस्ताव का विरोध दर्ज कराया। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि गांव की ऐतिहासिक पहचान को बनाए रखना आवश्यक है और सरकार को स्थानीय लोगों की भावना का सम्मान करना चाहिए।

नाम परिवर्तन प्रस्ताव ने बढ़ाया राजनीतिक विवाद

गांव का नाम बदलकर श्रीरामपुर करने के प्रस्ताव ने राजनीतिक बहस को भी जन्म दे दिया है। बताया जा रहा है कि क्षेत्रीय विधायक की ओर से नाम परिवर्तन के समर्थन में पत्र भेजा गया था, जिसके बाद मामला राज्य सरकार तक पहुंचा। मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस संबंध में जिला प्रशासन से रिपोर्ट मांगी है। अब प्रशासनिक स्तर पर फीडबैक और जनभावना के आधार पर आगे का निर्णय लिया जाएगा। फिलहाल गांव के लोग नाम परिवर्तन के विरोध में आंदोलन जारी रखने के संकेत दे रहे हैं।

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