बिहार MLC चुनाव: दीपक प्रकाश को टिकट नहीं मिलने से बढ़ीं चर्चाएं, उपेंद्र कुशवाहा को तीसरा बड़ा झटका?
बिहार विधान परिषद चुनाव के लिए एनडीए उम्मीदवारों की घोषणा के बाद राजनीतिक हलकों में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को एमएलसी उम्मीदवार नहीं बनाए जाने से कई सवाल खड़े हो रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे उपेंद्र कुशवाहा के लिए हाल के वर्षों का एक और बड़ा राजनीतिक झटका मान रहे हैं।
एनडीए ने घोषित किए आठ उम्मीदवार
बिहार विधान परिषद की नौ सीटों पर होने वाले चुनाव के लिए एनडीए ने अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। गठबंधन की ओर से बीजेपी, जेडीयू और लोजपा (रामविलास) के कुल आठ उम्मीदवार मैदान में उतारे गए हैं। विधानसभा में संख्या बल को देखते हुए एक सीट पर महागठबंधन के उम्मीदवार की जीत लगभग तय मानी जा रही है। उम्मीदवारों की सूची सामने आने के बाद यह साफ हो गया कि एनडीए ने सभी उपलब्ध सीटों का बंटवारा कर लिया है और राष्ट्रीय लोक मोर्चा को कोई सीट नहीं मिली।
दीपक प्रकाश के सामने सदस्यता का संकट
दीपक प्रकाश वर्तमान में बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री हैं, लेकिन वे विधानसभा या विधान परिषद के किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार मंत्री बनने के छह महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना जरूरी होता है। ऐसे में उन्हें एमएलसी बनाए जाने की संभावना जताई जा रही थी, लेकिन उम्मीदवारों की सूची में उनका नाम शामिल नहीं होने से उनके मंत्री पद के भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।
लोकसभा चुनाव में मिला था पहला झटका
राजनीतिक जानकारों के अनुसार उपेंद्र कुशवाहा को पहला बड़ा झटका 2024 के लोकसभा चुनाव में लगा था। काराकाट सीट से चुनाव लड़ते समय भोजपुरी अभिनेता Pawan Singh के निर्दलीय मैदान में उतरने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया था। चुनाव परिणाम में उपेंद्र कुशवाहा को हार का सामना करना पड़ा। हालांकि बाद में उन्हें राज्यसभा भेजकर एनडीए ने राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश की।
सम्राट चौधरी के उभार को दूसरा झटका माना जा रहा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुशवाहा समाज में प्रभाव को लेकर उपेंद्र कुशवाहा को दूसरा झटका तब लगा जब Samrat Choudhary का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा। कुशवाहा समुदाय के भीतर सम्राट चौधरी की स्वीकार्यता बढ़ने से उपेंद्र कुशवाहा की परंपरागत राजनीतिक पकड़ कमजोर होने की चर्चा होने लगी। इसी वजह से एनडीए के भीतर शक्ति संतुलन में भी बदलाव देखा गया।
एमएलसी टिकट नहीं मिलने से बढ़ी राजनीतिक अटकलें
अब दीपक प्रकाश को एमएलसी टिकट नहीं मिलने को तीसरे बड़े राजनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इससे यह संदेश जा सकता है कि एनडीए में राष्ट्रीय लोक मोर्चा की भूमिका पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रही। हालांकि गठबंधन की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में दीपक प्रकाश की सदस्यता और मंत्री पद को लेकर क्या राजनीतिक समाधान निकलता है।
आगे क्या होगा?
राज्यसभा में उपेंद्र कुशवाहा की मौजूदगी और बिहार की राजनीति में उनके सामाजिक आधार को देखते हुए राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि एनडीए पूरी तरह उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकता। हालांकि एमएलसी चुनाव में टिकट नहीं मिलने से यह संकेत जरूर मिला है कि गठबंधन के भीतर समीकरण बदल रहे हैं। आने वाले विधानसभा चुनावों और संगठनात्मक फैसलों से ही स्पष्ट होगा कि उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक भूमिका किस दिशा में आगे बढ़ती है।