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UAPA मामलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: एक साल में ट्रायल पूरा करने का निर्देश, राज्यों से 4 हफ्ते में मांगा जवाब

आतंकवाद से जुड़े मामलों में देरी को लेकर Supreme Court of India ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA) के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई एक वर्ष के भीतर पूरी होनी चाहिए। साथ ही, राज्यों को निर्देश दिया गया है कि लंबित मामलों के तेजी से निपटारे के लिए विशेष अदालतें और समर्पित लोक अभियोजक नियुक्त किए जाएं।

एक साल में ट्रायल पूरा करने की सख्त समयसीमा

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि National Investigation Agency (NIA) द्वारा जांच किए गए मामलों में अनावश्यक देरी अब स्वीकार्य नहीं होगी। अदालत ने निर्देश दिया कि हर हाल में इन मामलों की सुनवाई एक वर्ष के भीतर पूरी की जानी चाहिए। कोर्ट का मानना है कि लंबी सुनवाई और जमानत में देरी से न्याय व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। इसलिए समयबद्ध ट्रायल सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है, ताकि आरोपी और पीड़ित दोनों को समय पर न्याय मिल सके और न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा बना रहे।

राज्यों को विशेष अदालतें स्थापित करने का निर्देश

कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया कि वे लंबित UAPA मामलों के निपटारे के लिए अतिरिक्त विशेष अदालतों की स्थापना करें। साथ ही यह भी कहा गया कि हर अदालत में समर्पित लोक अभियोजक नियुक्त किए जाएं, ताकि रोजाना सुनवाई संभव हो सके। अदालत का मानना है कि विशेष अदालतों की संख्या बढ़ाने से मामलों का तेजी से निपटारा होगा और न्यायिक बोझ कम होगा। इसके अलावा, हाई कोर्ट को भी निर्देश दिए गए हैं कि इन अदालतों के लिए पर्याप्त स्टाफ और संसाधनों की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

17 राज्यों से 4 सप्ताह में मांगा गया जवाब

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने 17 राज्य सरकारों से चार सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा है। उनसे पूछा गया है कि लंबित NIA मामलों को निपटाने के लिए कितनी विशेष अदालतों की आवश्यकता होगी। कई राज्यों ने पहले ही केंद्र से मिलने वाली फंडिंग का उपयोग कर विशेष अदालतें स्थापित करने की इच्छा जताई है। अदालत अब यह जानना चाहती है कि राज्यों की वास्तविक जरूरत क्या है और वे इस दिशा में कितनी गंभीरता से कदम उठा रहे हैं।

केंद्र का रुख: अलग परिसर की जरूरत नहीं

केंद्र सरकार की ओर से बताया गया कि NIA मामलों के लिए अलग से नए न्यायालय परिसर बनाने की जरूरत नहीं है। गृह मंत्रालय ने राज्यों को सुझाव दिया है कि वे मौजूदा अदालतों में से ही किसी को विशेष NIA कोर्ट के रूप में नामित कर सकते हैं। इससे संसाधनों की बचत होगी और जल्दी से व्यवस्था लागू की जा सकेगी। हालांकि, इस प्रक्रिया में हाई कोर्ट की सहमति जरूरी बताई गई है, जिस पर आगे विचार किया जाएगा।

दिल्ली में सबसे ज्यादा लंबित मामले

देशभर में लंबित NIA मामलों की संख्या पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा मामले दिल्ली में हैं, जहां 59 केस लंबित हैं। इसके बाद जम्मू-कश्मीर में 38 और असम, केरल व गुजरात में 33-33 मामले लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के बराबर है। इसलिए जरूरी है कि इन मामलों की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर समयबद्ध तरीके से पूरी की जाए, ताकि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता बनी रहे।

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