ईरान पर दबाव बढ़ा रहे ट्रंप: मिडिल ईस्ट में दूसरा अमेरिकी विमानवाहक पोत तैनात…
✈️ मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ताकत का विस्तार
अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी और मजबूत करने का फैसला किया है। राष्ट्रपति Donald Trump के निर्देश पर दूसरा विमानवाहक पोत क्षेत्र में भेजा जा रहा है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते को लेकर कूटनीतिक बातचीत जारी है, लेकिन जमीनी स्तर पर तनाव कम होने के बजाय बढ़ता दिखाई दे रहा है।
⚓ पहले से तैनात है USS Abraham Lincoln
जनवरी के अंत में अमेरिका ने अपना विमानवाहक पोत USS Abraham Lincoln और उसके सहयोगी युद्धपोतों को मिडिल ईस्ट में तैनात किया था। यह तैनाती ईरान की गतिविधियों और क्षेत्रीय अस्थिरता को लेकर अमेरिकी चिंता के बीच की गई थी। यह स्ट्राइक ग्रुप अभी भी क्षेत्र में सक्रिय है और रणनीतिक निगरानी बनाए हुए है।
🚢 अब USS Gerald R. Ford की एंट्री
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अब दूसरा अत्याधुनिक विमानवाहक पोत USS Gerald R. Ford भी मिडिल ईस्ट की ओर बढ़ रहा है। यह पोत फिलहाल कैरेबियन सागर में तैनात था। इसके साथ कई सहायक युद्धपोत और फाइटर जेट्स भी शामिल हैं। यह दुनिया के सबसे आधुनिक एयरक्राफ्ट कैरियर्स में गिना जाता है, जिस पर अत्याधुनिक लड़ाकू विमान तैनात रहते हैं।
🌎 वेनेजुएला मिशन से मिडिल ईस्ट तक
रिपोर्ट्स के अनुसार, USS Gerald R. Ford को पहले मिडिल ईस्ट में तैनात किया गया था, लेकिन बाद में इसे कैरेबियन क्षेत्र में भेजा गया। बताया जाता है कि Venezuela से जुड़े एक सैन्य अभियान के दौरान इसके फाइटर जेट्स का इस्तेमाल किया गया था। अब इसे फिर से पश्चिम एशिया में रणनीतिक भूमिका निभाने के लिए भेजा जा रहा है।
☢️ परमाणु वार्ता और सैन्य दबाव की दोहरी रणनीति
एक ओर अमेरिका ईरान से परमाणु समझौते को लेकर बातचीत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सैन्य ताकत का प्रदर्शन भी कर रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी है कि यदि समझौता नहीं हुआ तो परिणाम “काफी दर्दनाक” हो सकते हैं। यह बयान संकेत देता है कि कूटनीति और सैन्य दबाव साथ-साथ चल रहे हैं।
🔍 क्या संकेत देता है यह कदम?
विश्लेषकों के मुताबिक, दूसरा विमानवाहक पोत भेजना सीधे हमले की तैयारी का संकेत नहीं, बल्कि “डिटरेंस” यानी रोकथाम की रणनीति हो सकता है। अमेरिका क्षेत्र में अपनी शक्ति संतुलन बनाए रखना चाहता है।
हालांकि, दो सक्रिय कैरियर स्ट्राइक ग्रुप की तैनाती यह भी दर्शाती है कि वॉशिंगटन किसी भी अप्रत्याशित परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहता है। इससे ईरान पर मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक दबाव दोनों बढ़ेंगे।
📌 आगे क्या?
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि दोनों विमानवाहक पोत कितने समय तक मिडिल ईस्ट में रहेंगे। यह भी तय नहीं है कि अमेरिका सैन्य कार्रवाई करेगा या केवल दबाव की रणनीति अपनाए रखेगा। लेकिन इतना तय है कि इस कदम से क्षेत्रीय तनाव में नई परत जुड़ गई है।