#देश दुनिया #पॉलिटिक्स #राज्य-शहर

“रेरा को बंद कर देना बेहतर होगा” : Supreme Court of India की तीखी टिप्पणी से मचा हलचल

देश की शीर्ष अदालत ने रियल एस्टेट सेक्टर को रेगुलेट करने वाली संस्था रेरा की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि अगर रेरा आम लोगों को राहत देने में विफल है, तो इसके अस्तित्व पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है।

रेरा की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी

गुरुवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) उन लोगों की मदद करने में असफल रही है, जिनके लिए इसका गठन किया गया था। अदालत ने टिप्पणी की कि यह संस्था अब डिफॉल्ट करने वाले बिल्डरों को संरक्षण देने वाली इकाई बनती जा रही है।

पीठ ने यह भी कहा कि जिन घर खरीदारों को राहत देने के उद्देश्य से रेरा बनाया गया था, वे आज निराश और हताश नजर आ रहे हैं।

हिमाचल में रेरा कार्यालय स्थानांतरण विवाद

मामला Himachal Pradesh में रेरा कार्यालय को शिमला से धर्मशाला स्थानांतरित करने से जुड़ा है। राज्य सरकार ने प्रशासनिक कारणों और शिमला में बढ़ती भीड़ को देखते हुए यह फैसला लिया था।

हालांकि, Himachal Pradesh High Court ने इस स्थानांतरण पर अंतरिम रोक लगा दी थी। राज्य सरकार ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार को अपनी पसंद की जगह पर रेरा कार्यालय स्थानांतरित करने की अनुमति दे दी। हालांकि यह अनुमति हाईकोर्ट में लंबित याचिका के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगी।

“रेरा बन गया है पुनर्वास केंद्र” – मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि रेरा में एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी की नियुक्ति की गई है। इस पर प्रधान न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि लगभग हर राज्य में रेरा पूर्व अधिकारियों के पुनर्वास केंद्र में बदलता जा रहा है।

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ऐसे अधिकारी शहरी विकास या नए शहरों को विकसित करने में प्रभावी योगदान दे सकते हैं। अदालत ने सुझाव दिया कि पर्यावरण और शहरी नियोजन की समझ रखने वाले विशेषज्ञों की सेवाएं ली जानी चाहिए।

अपील व्यवस्था में भी बदलाव का निर्देश

पीठ को बताया गया कि रेरा के आदेशों के खिलाफ अपीलें शिमला के जिला जज सुनते हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि अपीलीय अधिकार शिमला से धर्मशाला स्थानांतरित किए जाएं, ताकि प्रभावित पक्षों को अनावश्यक असुविधा न हो।

पहले भी जता चुका है असंतोष

सुप्रीम कोर्ट इससे पहले भी रेरा की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जता चुका है। 27 सितंबर 2024 को ‘भारती जगत जोशी बनाम भारतीय रिजर्व बैंक’ मामले में अदालत ने कहा था कि रेरा अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है।

इसी तरह 15 फरवरी 2022 को मॉडल बिल्डर-बायर एग्रीमेंट से जुड़े मामले में अदालत ने केंद्र सरकार से राज्यों में बनाए गए नियमों की समीक्षा करने को कहा था। उल्लेखनीय है कि रेरा कानून वर्ष 2016 में लागू किया गया था।

नीतिगत फैसलों में न्यायिक हस्तक्षेप पर टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कार्यालयों के स्थानांतरण जैसे मामले सामान्यतः नीतिगत निर्णय होते हैं और इनमें न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए। इससे पहले ओबीसी आयोग के स्थानांतरण से जुड़े मामले में भी अदालत इसी तरह का रुख अपना चुकी है।

क्या रेरा के भविष्य पर होगा पुनर्विचार?

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों के बाद रेरा की कार्यप्रणाली और संरचना को लेकर व्यापक बहस छिड़ना तय माना जा रहा है। यदि राज्यों ने व्यवस्था में सुधार नहीं किया, तो इस संस्था की उपयोगिता पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।

author avatar
stvnewsonline@gmail.com

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *