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‘अमेरिका ने टॉयलेट पेपर से भी बदतर इस्तेमाल किया’ – पाक रक्षा मंत्री का तीखा बयान

संसद में ख्वाजा आसिफ का बड़ा हमला

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संसद में अमेरिका को लेकर बेहद तीखा बयान दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका ने पाकिस्तान का इस्तेमाल “टॉयलेट पेपर से भी बदतर” तरीके से किया और काम निकलने के बाद उसे छोड़ दिया। उनका यह बयान देश की पुरानी विदेश और सुरक्षा नीतियों पर सीधा सवाल माना जा रहा है।

‘मेड इन अमेरिका जिहाद’ का जिक्र

संसद में बोलते हुए आसिफ ने कहा कि 1980 के दशक में अफगानिस्तान में लड़ा गया युद्ध वास्तव में पाकिस्तान का अपना नहीं था, बल्कि यह “मेड इन अमेरिका जिहाद” था। उनके मुताबिक, उस दौर में युद्ध को धार्मिक रंग देना पाकिस्तान की बड़ी रणनीतिक गलती साबित हुई।
उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को जिहाद के नाम पर तैयार किया गया, जबकि असल में यह संघर्ष अमेरिकी हितों से जुड़ा था।

शिक्षा और समाज पर दीर्घकालिक असर

आसिफ ने स्वीकार किया कि उस दौर में शिक्षा और सामाजिक ढांचे में ऐसे बदलाव किए गए, जिनसे कट्टरपंथ को बढ़ावा मिला। उन्होंने कहा कि उन नीतियों के प्रभाव आज भी पाकिस्तान के समाज में दिखाई देते हैं।

‘दूसरों के युद्ध में कूदने की कीमत’

रक्षा मंत्री ने कहा कि पाकिस्तान ने बार-बार ऐसे युद्धों में खुद को झोंका जो उसके अपने नहीं थे। इसका नतीजा यह हुआ कि देश को सुरक्षा, आर्थिक और सामाजिक मोर्चे पर भारी नुकसान उठाना पड़ा।

9/11 के बाद ‘किराये पर उपलब्ध देश’

ख्वाजा आसिफ ने 9/11 के बाद की नीतियों का जिक्र करते हुए कहा कि पाकिस्तान उस समय “आसानी से किराये पर उपलब्ध देश” बन गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका को संतुष्ट करने के लिए पाकिस्तान ने अपने दीर्घकालिक हितों की अनदेखी की।

सैन्य शासकों के फैसलों पर सवाल

आसिफ ने पूर्व सैन्य शासकों—ज़ियाउल हक़ और परवेज़ मुशर्रफ—के फैसलों की ओर भी इशारा किया। उनका कहना था कि बाहरी युद्धों में शामिल होने के निर्णयों ने पाकिस्तान की आंतरिक स्थिरता और अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचाया।

आत्ममंथन या सियासी संदेश?

ख्वाजा आसिफ का बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान आर्थिक संकट, सुरक्षा चुनौतियों और वैश्विक मंच पर नई रणनीतिक संतुलन की कोशिशों से जूझ रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान एक तरह से अतीत की नीतियों पर आत्ममंथन भी है और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में एक सियासी संदेश भी।
यह साफ है कि अफगान युद्ध और 9/11 के बाद की रणनीतियों ने पाकिस्तान की विदेश नीति की दिशा और उसके आंतरिक हालात पर गहरा प्रभाव डाला है—जिसकी गूंज आज भी संसद से लेकर सड़कों तक सुनाई दे रही है।

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