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RCEP में भारत की एंट्री पर विराम: चीन-केंद्रित ढांचे से दूरी, द्विपक्षीय समझौतों पर जोर

नई दिल्ली ने साफ कर दिया है कि भारत फिलहाल चीन समर्थित क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (RCEP) में शामिल होने पर विचार नहीं कर रहा है। सरकारी सूत्रों ने एनडीटीवी को बताया कि इस बहुपक्षीय व्यापार समझौते पर दोबारा सोचने की अटकलें निराधार हैं।

सरकारी सूत्रों का स्पष्ट संदेश

एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा,

“अभी RCEP में शामिल होने को लेकर कोई प्रस्ताव या विचार नहीं है।”

एक अन्य सूत्र ने राजनीतिक संकेत देते हुए कहा कि RCEP को एक ऐसे मंच के रूप में देखा जा सकता है, जो व्यवहारिक रूप से चीन-केंद्रित व्यापार चैनल बन चुका है। यही भारत की सबसे बड़ी चिंता है।

क्यों बना हुआ है भारत का फासला

भारत की व्यापार रणनीति का फोकस बड़े क्षेत्रीय समझौतों के बजाय द्विपक्षीय व्यापार समझौतों पर है। सरकार का मानना है कि व्यापक टैरिफ कटौती वाले ढांचे भारत की आयात-संवेदनशीलता को संभालने की क्षमता को कमजोर कर सकते हैं।

सूत्रों के अनुसार, RCEP के अधिकांश सदस्य देशों के साथ भारत के पहले से ही द्विपक्षीय समझौते मौजूद हैं या बातचीत के दौर में हैं। ऐसे में RCEP में शामिल हुए बिना भी भारत को बाजार पहुंच मिल सकती है।

चीन से जुड़े जोखिमों पर सतर्कता

भारत को आशंका है कि चीन के साथ बड़े पैमाने पर टैरिफ कटौती से घरेलू उद्योग, कृषि और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि सरकार किसी भी ऐसे ढांचे से बचना चाहती है, जो चीन पर निर्भरता बढ़ाए।

यूरोप मॉडल से मिलती रणनीति

सरकारी सूत्रों ने बताया कि भारत-यूरोपीय संघ व्यापार वार्ता में भी यही रणनीति अपनाई गई है—

  • लगभग 92% टैरिफ लाइनों को चरणबद्ध तरीके से खोलना
  • संवेदनशील क्षेत्रों में कोटा और टैरिफ-रेट कोटा का इस्तेमाल

यही संतुलित दृष्टिकोण RCEP के मामले में भी अपनाया जा रहा है।

द्विपक्षीय समझौतों की ओर झुकाव

वैश्विक व्यापार अब एक-समान WTO मॉडल से हटकर मल्टी-लेयर द्विपक्षीय ढांचे की ओर बढ़ रहा है। कोविड के बाद आपूर्ति-श्रृंखला संकट और व्यापार के “हथियारीकरण” ने देशों को ज्यादा सतर्क बना दिया है।

भारत अब यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और EFTA जैसे साझेदारों के साथ गहराई से जुड़ना चाहता है, लेकिन किसी एक भौगोलिक क्षेत्र पर निर्भरता नहीं बढ़ाना चाहता।

RCEP पर भारत का स्थायी रुख

भारत 2019 में ही RCEP से बाहर हो चुका है। उस वक्त बाजार पहुंच, नियमों की जटिलता और सस्ते आयात में अचानक बढ़ोतरी जैसी चिंताएं सामने आई थीं। मौजूदा रुख उसी नीति की निरंतरता को दर्शाता है।


भारत का संदेश साफ है—

  • गुटबंदी नहीं, द्विपक्षीयता
  • तेज उदारीकरण नहीं, संतुलित खुलापन
  • चीन-केंद्रित ढांचे से स्पष्ट दूरी

यह रुख घरेलू उद्योग को स्थिरता और पूर्वानुमान देने के साथ-साथ भारत की दीर्घकालिक व्यापार सुरक्षा रणनीति को भी मजबूत करता है।

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