जैसलमेर में दिल दहला देने वाली आग: तीन परिवारों की जिंदगी राख, 10 लाख कैश और 25 तोला सोना खाक
राजस्थान के सरहदी जिले जैसलमेर के लाठी क्षेत्र के धोलिया गांव में अलसुबह लगी आग ने तीन परिवारों का सब कुछ छीन लिया। यह सिर्फ एक हादसा नहीं था, बल्कि वर्षों की मेहनत, जमा पूंजी और सुरक्षित भविष्य की उम्मीदों का अंत बन गया। अब इन परिवारों के पास तन पर बचे कपड़ों के सिवा कुछ भी नहीं है।
1. नींद में थे परिवार, आग बन गई काल
शुक्रवार तड़के करीब चार बजे नरेश, सुरेश और उनके परिजन गहरी नींद में थे। तभी बिजली के तारों में शॉर्ट सर्किट से अचानक आग भड़क उठी। कुछ ही मिनटों में चार कमरों का मकान आग की चपेट में आ गया। जब तक लोग जागे, चारों ओर धुआं और लपटें थीं। बच्चों को गोद में उठाकर जिस हालत में बाहर निकले, उसी हालत में उनकी जिंदगी ठहर गई।
ग्रामीण इलाकों में बिजली सुरक्षा और आपातकालीन इंतजामों की कमी ऐसे हादसों को और घातक बना देती है।
2. 10 लाख नकद राख, सोना बन गया ‘कोयला’
पीड़ित नरेश विश्नोई के मुताबिक उन्होंने हाल ही में फसल बेची थी और करीब 10 लाख रुपये नकद घर में रखे थे। आग इतनी तेज थी कि अलमारी में रखे नोट पलभर में जलकर राख हो गए। इसके साथ ही 25 तोला सोना और चांदी के गहने भी पूरी तरह काले पड़ गए। साल भर का अनाज और घरेलू सामान अब राख के ढेर में बदल चुका है।
ग्रामीण परिवारों में नकद और जेवर ही जीवनभर की पूंजी होते हैं। एक ही हादसा उन्हें पूरी तरह बेसहारा बना देता है।
3. ग्रामीणों ने बचाई जानें, सिस्टम रहा नदारद
ग्रामीणों का कहना है कि पोकरण दमकल विभाग को तुरंत सूचना दी गई थी, लेकिन करीब दो घंटे तक कोई मदद नहीं पहुंची। इस दौरान गांव के लोगों ने ट्रैक्टरों से पानी और रेत डालकर आग पर काबू पाने की कोशिश की। अगर ग्रामीण तुरंत मोर्चा नहीं संभालते, तो जानी नुकसान भी हो सकता था।
यह घटना बताती है कि दूर-दराज के इलाकों में आपात सेवाओं तक पहुंच अब भी बड़ी चुनौती है।
4. गांव में मातम, मुआवजे की मांग
घटना के बाद पूरे धोलिया गांव में चूल्हे तक नहीं जले। ग्रामीणों का कहना है कि पीड़ित परिवार अब पूरी तरह सड़क पर आ गए हैं और उन्हें तुरंत आर्थिक सहायता की जरूरत है। लाठी थाना पुलिस ने मौके पर पहुंचकर नुकसान का आकलन किया है।
आपदा के बाद त्वरित राहत और पुनर्वास ही पीड़ितों को दोबारा खड़ा कर सकता है, वरना गरीबी का दुष्चक्र और गहराता है।
5. फायर ब्रिगेड क्यों नहीं पहुंची? विभाग का पक्ष
असिस्टेंट फायर ऑफिसर के.पी. राठौड़ ने बताया कि सूचना उन्हें देर से मिली और ग्रामीणों ने फोन पर कहा था कि वे आग पर काबू पा रहे हैं। बाद में बताया गया कि आग बुझ चुकी है, इसलिए वाहन मौके पर नहीं भेजा गया। अधिकारियों ने यह भी कहा कि जिले में केवल जैसलमेर और पोकरण शहरों में ही दमकल सेवाएं हैं, ऐसे में दूरस्थ गांवों तक पहुंचने में अक्सर देरी हो जाती है।
यह बयान व्यवस्थागत सीमाओं को उजागर करता है—बड़े भौगोलिक क्षेत्र में सीमित संसाधन आपदा प्रबंधन को कमजोर बना देते हैं।
धोलिया गांव की यह त्रासदी सिर्फ एक आगजनी नहीं, बल्कि ग्रामीण इलाकों में आपात सेवाओं, बिजली सुरक्षा और आपदा राहत व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। तीन परिवारों की जिंदगी एक पल में राख हो गई। अब जरूरत है त्वरित मुआवजे, स्थायी पुनर्वास और ऐसे हादसों को रोकने के लिए मजबूत ढांचे की।