गाजा में फोर्स भेजने की तैयारी पर बांग्लादेश सरकार को झटका, फिलिस्तीन समर्थकों का खुला विरोध
गाजा के लिए प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय “स्टेबिलाइजेशन फोर्स” में शामिल होने के संकेत देकर बांग्लादेश की अंतरिम सरकार घरेलू विवाद में घिर गई है। देश के प्रभावशाली फिलिस्तीन समर्थक समूहों ने इसे बांग्लादेश की ऐतिहासिक नीति के खिलाफ बताया है और सरकार से साफ कहा है कि वह किसी भी सैन्य या सुरक्षा ढांचे का हिस्सा न बने। यह मामला अब केवल विदेश नीति नहीं, बल्कि नैतिक और राजनीतिक बहस का रूप ले चुका है।
🗣️ फिलिस्तीन समर्थक संगठनों का सख्त विरोध
‘पैलेस्टाइन सॉलिडैरिटी कमेटी’ ने सरकार को चेतावनी दी है कि वह गाजा के लिए प्रस्तावित इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स में किसी भी तरह की भागीदारी न करे। संगठन का कहना है कि बांग्लादेश की परंपरागत नीति हमेशा फिलिस्तीनी जनता के पक्ष में रही है और किसी अंतरराष्ट्रीय सैन्य व्यवस्था का हिस्सा बनना इसी मूल रुख से भटकने जैसा होगा।
🚨 “मानवीय संकट में सैन्य मौजूदगी तनाव बढ़ाएगी”
समिति ने अपने बयान में कहा कि गाजा पहले से ही गंभीर मानवीय संकट से जूझ रहा है—हिंसा, विस्थापन और बुनियादी सुविधाओं की कमी आम नागरिकों की रोजमर्रा की हकीकत बन चुकी है। ऐसे में किसी “स्टेबिलाइजेशन फोर्स” की तैनाती शांति लाने के बजाय ज़मीनी तनाव को और बढ़ा सकती है।
उनका तर्क है कि फिलिस्तीन का मुद्दा सैन्य हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण राजनीतिक समाधान और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन से सुलझाया जा सकता है।
🎯 समिति का आरोप: “इजरायल की सुरक्षा के नाम पर फिलिस्तीनी आंदोलन दबेगा”
समिति के सदस्य-सचिव प्रो. एमडी हारुन-ओर-रशीद ने कहा कि इस तरह की फोर्स का असली मकसद इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करना होगा। उनके अनुसार, इसके तहत गाजा में आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे समूहों से हथियार छीने जाएंगे और फिलिस्तीनी प्रतिरोध आंदोलन को कमजोर किया जाएगा।
🧾 अमेरिका में बैठक से भड़का विवाद
विवाद तब और गहरा गया जब यह जानकारी सामने आई कि बांग्लादेश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार खलीलुर रहमान ने वॉशिंगटन में अमेरिकी अधिकारियों से मुलाकात के दौरान गाजा स्टेबिलाइजेशन फोर्स में बांग्लादेश की “दिलचस्पी” जताई।
समिति ने आरोप लगाया कि यह रुख अमेरिका की विदेश नीति के अनुरूप है और बांग्लादेश की स्वतंत्र कूटनीतिक सोच को कमजोर करता है।
🪖 “पाकिस्तान की राह पर चलने की कोशिश?”
समर्थक संगठनों का कहना है कि जिस तरह पाकिस्तान ने गाजा में सैन्य भागीदारी का संकेत दिया है, उसी तर्ज पर बांग्लादेश भी कदम बढ़ाने की तैयारी में है। सरकार की ओर से सैद्धांतिक सहमति के संकेत दिए जाने के बाद ही यह विरोध तेज हुआ है।
🕊️ ऐतिहासिक स्मृति: “हम खुद संघर्ष से जन्मे हैं”
पैलेस्टाइन सॉलिडैरिटी कमेटी ने याद दिलाया कि बांग्लादेश का जन्म भी स्वतंत्रता संग्राम और उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष से हुआ था। ऐसे में बांग्लादेशी जनता स्वाभाविक रूप से उन लोगों के दर्द को समझती है जो आज कब्जे और हिंसा का सामना कर रहे हैं।
उनका कहना है कि फिलिस्तीन के मामले में सैन्य गठबंधनों में शामिल होना देश की नैतिक पहचान पर सवाल खड़ा करेगा।
🌍 फिलिस्तीन पर बांग्लादेश का पारंपरिक रुख
बांग्लादेश ने वर्षों से संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फिलिस्तीनी आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया है और इजरायली कब्जे की आलोचना की है।
समिति का मानना है कि गाजा स्टेबिलाइजेशन फोर्स में भागीदारी इस लंबे समय से चले आ रहे नैतिक और कूटनीतिक रुख को कमजोर कर सकती है।
⏳ सरकार की चुप्पी, लेकिन विवाद बढ़ता जा रहा
फिलहाल बांग्लादेश सरकार की ओर से इस विरोध पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि, यह मुद्दा ऐसे समय उभरा है जब मध्य-पूर्व की स्थिति वैश्विक राजनीति का केंद्र बनी हुई है और हर कदम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरे निहितार्थ रखता है।
🔎 क्या यह फैसला विदेश नीति की नई दिशा तय करेगा?
गाजा में किसी अंतरराष्ट्रीय फोर्स में शामिल होना केवल सुरक्षा का सवाल नहीं है, बल्कि यह बांग्लादेश की पहचान, उसकी नैतिक विदेश नीति और घरेलू जनभावना से भी जुड़ा है।
फिलिस्तीन समर्थक संगठनों का विरोध यह संकेत देता है कि सरकार के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा। यदि बांग्लादेश सैन्य भागीदारी की ओर बढ़ता है, तो उसे घरेलू असंतोष के साथ-साथ अपनी पारंपरिक कूटनीति पर भी पुनर्विचार करना पड़ेगा।