ट्रंप से बहुत पहले: 158 साल से क्यों ग्रीनलैंड पर नज़र टिकाए है अमेरिका? ‘आर्कटिक मिशन’ की पूरी कहानी
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को “किसी भी कीमत पर” हासिल करने के संकेतों ने एक बार फिर इस बर्फीले द्वीप को वैश्विक राजनीति के केंद्र में ला दिया है। लेकिन यह जिद नई नहीं है। अमेरिका पिछले डेढ़ सदी में कम से कम तीन बार ग्रीनलैंड को अपने पाले में लाने की कोशिश कर चुका है। सवाल है—आखिर ऐसा क्या है इस द्वीप में कि वॉशिंगटन 158 साल से पीछे नहीं हट रहा?
नोट: ग्रीनलैंड 1979 से व्यापक स्वशासन वाला क्षेत्र है, जबकि रक्षा और विदेश नीति डेनमार्क के अधीन है—इसीलिए इसे डेनमार्क का अर्ध-स्वायत्त हिस्सा माना जाता है।
📌 158 साल पुराना ‘आर्कटिक मिशन’: कब-कब हुई कोशिश?
1) 1867–68: अलास्का के तुरंत बाद की नज़र
अलास्का खरीदने के बाद तत्कालीन विदेश मंत्री विलियम सीवार्ड ने आर्कटिक विस्तार की रणनीति पर काम शुरू किया। ग्रीनलैंड को कोयला व अन्य संसाधनों से भरपूर माना गया, लेकिन अमेरिकी कांग्रेस की रुचि नहीं दिखी और यह विचार प्रस्ताव बनने से पहले ही ठंडे बस्ते में चला गया।
2) 1910: ‘लैंड-स्वैप’ का असफल प्रयोग
राष्ट्रपति विलियम हॉवर्ड टैफ्ट के दौर में डेनमार्क को दूसरी जमीन देकर बदले में ग्रीनलैंड लेने का विचार उभरा। कोपेनहेगन ने इसे खारिज कर दिया और योजना वहीं समाप्त हो गई।
3) 1946: 100 मिलियन डॉलर का ऑफर
शीत युद्ध की आहट के बीच राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने रणनीतिक वजहों से डेनमार्क को 100 मिलियन डॉलर (सोने में) की पेशकश की। द्वितीय विश्व युद्ध में ग्रीनलैंड के एयरफील्ड्स यूरोप जाते विमानों के लिए अहम पड़ाव थे। डेनमार्क ने प्रस्ताव ठुकराया, पर अमेरिका ने सैन्य पहुंच बनाए रखी—जो आज भी पिटुफिक स्पेस बेस के रूप में मौजूद है।
📌 आज भी क्यों कायम है अमेरिकी दिलचस्पी?
🔹 भू-रणनीतिक लोकेशन
ग्रीनलैंड अटलांटिक और आर्कटिक को जोड़ने वाले अहम नौसैनिक गलियारे पर स्थित है। यहां मौजूद अमेरिकी बेस मिसाइल डिफेंस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आर्कटिक सर्कल के भीतर बढ़ती महाशक्तियों की होड़ में यह द्वीप एक अग्रिम चौकी (आउटपोस्ट) जैसा है।
🔹 रेयर अर्थ मिनरल्स का खजाना
बैटरियों, स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहनों और रक्षा तकनीक के लिए जरूरी दुर्लभ खनिजों में चीन की वैश्विक पकड़ को चुनौती देने के लिए अमेरिका वैकल्पिक स्रोत चाहता है—और ग्रीनलैंड इस लिहाज से बेहद आकर्षक है।
🔹 ऊर्जा संसाधनों की संभावना
वैज्ञानिक आकलन बताते हैं कि महाद्वीपीय शेल्फ के कुछ हिस्सों में तेल-गैस के बड़े, अब तक अनछुए भंडार हो सकते हैं। पर्यावरणीय जोखिमों के कारण डेनमार्क ने दोहन से दूरी बनाई है, लेकिन अमेरिकी रणनीतिकार इस संभावनाओं पर नज़र रखते हैं।
📌 ट्रंप का दांव: दबाव, प्रलोभन और संदेश
डेनमार्क व ग्रीनलैंड की सरकारों की आपत्ति के बावजूद ट्रंप ने कभी सैन्य ताकत का संकेत दिया, तो कभी स्थानीय लोगों के लिए आर्थिक फायदे गिनाए। उनके बयानों ने स्पष्ट कर दिया कि वॉशिंगटन इसे केवल ‘खरीद’ नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखता है।
🔎 इतिहास, संसाधन और आर्कटिक की नई भू-राजनीति
सब-हेडलाइन: “यह सिर्फ जमीन नहीं, भविष्य की बढ़त की लड़ाई है”
ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नजरें इतिहास, भूगोल और संसाधनों के त्रिकोण से तय होती हैं। जैसे-जैसे आर्कटिक के समुद्री मार्ग खुल रहे हैं और खनिज-ऊर्जा की दौड़ तेज हो रही है, वैसे-वैसे यह द्वीप महाशक्तियों की शतरंज में एक निर्णायक मोहरा बनता जा रहा है। ट्रंप की ताज़ा पहल उसी 158 साल पुराने ‘आर्कटिक मिशन’ की अगली कड़ी है।