ईरान में बार-बार विद्रोह के बावजूद क्यों नहीं गिरता खामेनेई शासन? जानिए 5 बड़ी वजहें
ईरान में एक बार फिर देशव्यापी हिंसक विरोध-प्रदर्शन देखने को मिले। हजारों लोगों की मौत, अंतरराष्ट्रीय दबाव और अमेरिका तक की धमकियों के बावजूद नतीजा वही रहा—सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई का शासन बरकरार। सवाल यह है कि दशकों से जारी विद्रोह और असंतोष के बावजूद ईरान में सत्ता परिवर्तन क्यों नहीं हो पाया?
🟠 37 साल से सत्ता में अडिग सुप्रीम लीडर
अयातुल्लाह अली खामेनेई 1989 से ईरान के सुप्रीम लीडर हैं। इस दौरान कई बार देश में बड़े आंदोलन हुए, जनता सड़कों पर उतरी और पश्चिमी देशों ने शासन बदलने की कोशिशें भी कीं, लेकिन सत्ता की कुर्सी नहीं डगमगाई।
ईरान में सत्ता व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सुदृढ़ वैचारिक और संस्थागत ढांचे पर टिकी है।
🟠 1. सुप्रीम लीडर के हाथों में सत्ता का पूरा केंद्रीकरण
खामेनेई के पास न्यायपालिका, मीडिया, चुनाव प्रक्रिया और सुरक्षा तंत्र पर निर्णायक नियंत्रण है।
- गार्जियन काउंसिल के सदस्य
- न्यायपालिका प्रमुख
- सरकारी मीडिया प्रमुख
- आंतरिक सुरक्षा से जुड़े मंत्रालय
सभी की नियुक्ति सुप्रीम लीडर की मंजूरी से होती है।
जब सत्ता के सभी स्तंभ एक व्यक्ति के अधीन हों, तो तख्तापलट की संभावनाएं बेहद कमजोर हो जाती हैं।
🟠 2. सेना और सुरक्षा बलों पर पूर्ण नियंत्रण
ईरान की सबसे ताकतवर सैन्य शक्ति—रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) और बसीज—सीधे सुप्रीम लीडर के अधीन हैं। इनका मूल उद्देश्य ही इस्लामिक क्रांति और शासन की रक्षा है।
जब सेना जनता की बजाय शासक के प्रति वफादार हो, तो जनविद्रोह सत्ता परिवर्तन में नहीं बदल पाता।
🟠 3. शासक वर्ग की मजबूत एकजुटता
आर्थिक संकट, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध और सैन्य असफलताओं के बावजूद खामेनेई के करीबी मौलवी, नेता और सैन्य कमांडर सार्वजनिक रूप से उनसे अलग नहीं हुए।
हालिया विद्रोह में भी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने प्रदर्शनकारियों से संवाद की बात कही, लेकिन सुप्रीम लीडर पर कोई सवाल नहीं उठाया।
जब सत्ता के भीतर दरार न पड़े, तो बाहर का दबाव सीमित असर ही डालता है।
🟠 4. कट्टर समर्थकों का मजबूत सामाजिक आधार
विशेषज्ञों के अनुसार ईरान के करीब 20% मतदाता आज भी शासन के कट्टर समर्थक हैं। यह संख्या भले ही अल्पसंख्यक हो, लेकिन सत्ता को स्थिर रखने के लिए पर्याप्त है।
हर शासन को टिके रहने के लिए बहुमत नहीं, बल्कि संगठित और वफादार समर्थन चाहिए।
🟠 5. ‘बचे रहना’ ही जीत का नैरेटिव
खामेनेई शासन हर संकट को वैचारिक जीत के रूप में पेश करता है।
- विदेशी साजिशों का हवाला
- इस्लामी मूल्यों की रक्षा
- पश्चिमी देशों को दुश्मन बताना
इसी नैरेटिव के जरिए दमन को भी正 ठहराया जाता है।
यह रणनीति शासन को नैतिक वैधता देने के साथ समर्थकों को लामबंद रखती है।
🟠 विरोध प्रदर्शन कमजोर करते हैं, गिरा नहीं पाते
लगातार विरोधों ने ईरान की व्यवस्था को दबाव में जरूर डाला है, लेकिन सत्ता परिवर्तन के लिए जरूरी संस्थागत टूट अब तक नहीं हो पाई है।
जब तक सेना, शासक वर्ग और वैचारिक आधार एक साथ खड़े हैं, तब तक विद्रोह शासन को हिला तो सकते हैं, गिरा नहीं सकते।