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तेल, ताकत और ट्रंप की नई नीति: वेनेजुएला पर अमेरिकी कार्रवाई शांति है या शक्ति प्रदर्शन?


इतिहास गवाह है कि जब भी कोई महाशक्ति खुद को लोकतंत्र और मानवाधिकारों का संरक्षक घोषित करती है, उसके हस्तक्षेप कई बार दूसरे देशों की संप्रभुता को कुचल देता है। वेनेजुएला पर अमेरिका की हालिया कार्रवाई को भी इसी दृष्टि से देखा जा रहा है—जहां मानवाधिकार और लोकतंत्र की भाषा के पीछे राजनीतिक हित, तेल संसाधन और भू-रणनीतिक प्रभुत्व की छाया दिखाई देती है। यह कदम न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कानूनों को चुनौती देता है, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है जो समानता और न्याय की बात तो करती है, पर शक्तिशाली देशों को अपवाद दे देती है।


⚖️ 1. क्या अमेरिका नियमों से ऊपर है?

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी को लेकर यह सवाल तेज़ हो गया है कि क्या अमेरिका खुद को वैश्विक कानूनों से ऊपर मानता है। एक संप्रभु देश के नेता को सैन्य कार्रवाई में हिरासत में लेना अंतरराष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन जैसा प्रतीत होता है।
यह संदेश भी जाता है कि “रूल-बेस्ड ऑर्डर” सिर्फ कमज़ोर देशों के लिए है, जबकि महाशक्तियाँ जब चाहें उसे दरकिनार कर सकती हैं।


🌐 2. संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर सवाल

इस कार्रवाई के बाद संयुक्त राष्ट्र में चिंता जताई गई कि इससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है और सभी देशों को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करना चाहिए।
पर बड़ा प्रश्न यह है—क्या अमेरिका स्वयं संयुक्त राष्ट्र चार्टर की बात मानेगा?
यही दोहरा मापदंड तब और स्पष्ट होता है जब इज़राइल या अन्य सहयोगी देशों के मामलों में अंतरराष्ट्रीय निर्देशों की अनदेखी की जाती है, जबकि रूस या चीन पर नैतिकता के नाम पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं।


❄️ 3. क्या शीत युद्ध की वापसी हो रही है?

वेनेजुएला पर सीधी सैन्य कार्रवाई ने वैश्विक राजनीति में पुराने ध्रुवीकरण को फिर हवा दे दी है।

  • चीन ने संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका को “गैर-हस्तक्षेप” की नीति अपनाने की नसीहत दी।
  • रूस ने दोहरे मानकों की ओर इशारा करते हुए कहा कि यदि अमेरिका अपने हितों के नाम पर कार्रवाई कर सकता है, तो वही तर्क अन्य देश भी दे सकते हैं।

इससे यूक्रेन युद्ध और ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर टकराव और गहरा सकता है।


🌏 4. चीन और अमेरिका: नैतिकता बनाम भू-रणनीति

बीजिंग अब ताइवान, दक्षिण चीन सागर और अन्य विवादों पर अपने दावों के समर्थन में यही तर्क दे सकता है कि अमेरिका खुद अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अनदेखी कर रहा है।
चीन की सरकारी एजेंसी शिन्हुआ ने अमेरिकी कदम को “आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास” बताया और कहा कि तथाकथित नियम-आधारित व्यवस्था असल में अमेरिकी हितों पर टिकी है।


🧭 5. पश्चिमी देशों का दोहरा रवैया

ब्रिटेन, स्पेन और अन्य यूरोपीय देशों की प्रतिक्रियाएं भी इस दोहरेपन को दर्शाती हैं—जहां अमेरिका की सीधी आलोचना से बचते हुए केवल “शांति” और “संवाद” की अपील की गई।
मानवाधिकारों पर दुनिया को उपदेश देने वाले देश जब अपने सहयोगियों के मामलों में चुप रहते हैं, तो उनकी नैतिक विश्वसनीयता कमजोर पड़ती है।


🕰️ 6. अमेरिकी हस्तक्षेप का इतिहास

वेनेजुएला का मामला कोई अपवाद नहीं है:

  • पनामा (1989): मैनुअल नोरीएगा की गिरफ्तारी
  • हैती (1915–1934): सैन्य दख़ल
  • इराक (2003): सद्दाम हुसैन की गिरफ़्तारी और फांसी
  • होंडुरास: राष्ट्रपति पर ड्रग तस्करी के आरोप

हर बार तर्क यही रहा—लोकतंत्र, मानवाधिकार और अमेरिकी हितों की रक्षा।


🛢️ 7. तेल और भू-रणनीति का असली खेल

वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि इस कार्रवाई के पीछे केंद्रीय कारण यही संसाधन और क्षेत्रीय प्रभुत्व है।
न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अख़बारों के अनुसार, अमेरिका अब वेनेजुएला की राजनीतिक दिशा तय करना चाहता है—यानी सत्ता के संतुलन में सीधा हस्तक्षेप।


📊 शांति की नीति या शक्ति का प्रदर्शन?

यह कार्रवाई ट्रंप प्रशासन की नई राष्ट्रीय सुरक्षा नीति से जुड़ी मानी जा रही है, जिसे कुछ लोग “ट्रंप कोरोलरी” कह रहे हैं—मोनरो डॉक्ट्रिन का विस्तार, जिसमें पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी वर्चस्व को खुलकर स्थापित करने की बात है।
इसका अर्थ है कि अब कूटनीति के बजाय ताकत को प्राथमिकता दी जा रही है।


वेनेजुएला पर अमेरिकी कदम यह दर्शाता है कि वैश्विक राजनीति में आज भी नैतिकता नहीं, बल्कि शक्ति और संसाधन निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
यदि विश्व सचमुच शांति, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, तो उसे दोहरे मापदंड छोड़कर संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करना होगा।
अन्यथा, लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर की गई ऐसी कार्रवाइयाँ केवल अविश्वास, अस्थिरता और टकराव की विरासत ही छोड़ेंगी।

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