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ट्रंप की जिनपिंग से हो गई डील? वेनेजुएला के बदले ताइवान पर नरमी का बड़ा संकेत


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक इंटरव्यू ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। न्यूयॉर्क टाइम्स से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि उनके फैसलों को अंतरराष्ट्रीय कानून नहीं, बल्कि उनकी अपनी नैतिकता और सोच दिशा देती है। इसी बातचीत के दौरान ट्रंप के चीन–ताइवान, वेनेजुएला, नाटो और ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयानों से यह सवाल उठने लगा है—क्या वेनेजुएला पर कार्रवाई के बदले ताइवान के मुद्दे पर अमेरिका नरमी बरत सकता है?


🔹 “अंतरराष्ट्रीय कानून नहीं, मेरी नैतिकता मायने रखती है”

जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या उनकी वैश्विक शक्ति की कोई सीमा है, तो उन्होंने दो टूक कहा कि उन्हें रोकने वाली केवल उनकी अपनी नैतिकता और सोच है। उन्होंने कहा, “मेरी अपनी नैतिकता. मेरा अपना दिमाग. यही एकमात्र चीज है जो मुझे रोक सकती है. मुझे अंतरराष्ट्रीय कानून की जरूरत नहीं है।”
हालांकि, आगे सवाल करने पर उन्होंने यह भी कहा कि वह लोगों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते और सरकार कानून का पालन करती है। फिर भी, इस बयान ने अमेरिका की विदेश नीति की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


🔹 वेनेजुएला के बाद ताइवान पर चुप्पी?

वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि अगर चीन ताइवान पर कदम उठाता है तो अमेरिका क्या करेगा। इसी पर पूछे गए सवाल पर ट्रंप ने कहा कि यह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर निर्भर करता है कि वह क्या करेंगे।
उन्होंने कहा कि उन्होंने जिनपिंग से कहा है कि अगर चीन ताइवान पर कोई कार्रवाई करता है तो उन्हें “बहुत दुख होगा” और उन्हें नहीं लगता कि ऐसा होगा। ट्रंप ने यह भी जोड़ा कि उनके राष्ट्रपति रहते हुए चीन ऐसा कदम नहीं उठाएगा, लेकिन भविष्य में स्थिति बदल सकती है।


🔹 संकेत: ताइवान को अपने हाल पर छोड़ा जा सकता है?

चीन–ताइवान तनाव और हालिया सैन्य गतिविधियों पर ट्रंप ने कहा कि उनके कार्यकाल में चीन ऐसा नहीं करेगा। उनके शब्दों को विश्लेषकों ने इस रूप में लिया कि अमेरिका की प्रतिक्रिया अनिश्चित हो सकती है। यही वजह है कि कुछ हलकों में यह कयास लगने लगे हैं कि वेनेजुएला पर सख्ती के बदले ताइवान के मुद्दे पर अमेरिका नरमी दिखा सकता है।


🔹 ग्रीनलैंड और नाटो: “स्वामित्व बहुत महत्वपूर्ण है”

इंटरव्यू में ट्रंप से पूछा गया कि उनके लिए ज्यादा अहम क्या है—ग्रीनलैंड या नाटो? इस पर उन्होंने सीधा जवाब देने से बचते हुए कहा कि “यह एक विकल्प हो सकता है।”
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप ने कहा कि “स्वामित्व बहुत महत्वपूर्ण है,” क्योंकि इससे मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक लाभ मिलता है जो केवल समझौते या संधि से संभव नहीं। उन्होंने दावा किया कि राष्ट्रीय सफलता के लिए कुछ क्षेत्रों पर स्वामित्व जरूरी है।


🔹 जेडी वेंस का समर्थन, यूरोप को चेतावनी

इससे पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कहा था कि यूरोपीय नेताओं को ग्रीनलैंड पर ट्रंप को गंभीरता से लेना चाहिए।
यूरोप और नाटो पर बोलते हुए ट्रंप ने कहा कि उन्होंने ही यूरोपीय देशों को रक्षा खर्च बढ़ाने के लिए मजबूर किया। उन्होंने दावा किया कि अगर वह राष्ट्रपति न होते, तो रूस अब तक पूरे यूक्रेन पर कब्जा कर चुका होता।


🔹 क्या यह अमेरिका की नई “डील-डिप्लोमेसी” है?

ट्रंप के बयान यह संकेत देते हैं कि उनकी विदेश नीति नियमों से ज्यादा सौदेबाजी पर आधारित है। एक तरफ वे वेनेजुएला जैसे देशों पर सख्त रुख दिखाते हैं, दूसरी तरफ ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दे पर स्पष्ट प्रतिबद्धता से बचते नजर आते हैं। इससे यह धारणा बन रही है कि वैश्विक राजनीति में ट्रंप “क्विड प्रो क्वो”—यानी एक मुद्दे के बदले दूसरे पर समझौते—की रणनीति अपना सकते हैं।


🔹 दुनिया के लिए अनिश्चित संकेत

ट्रंप का यह रुख न केवल अमेरिका की विदेश नीति को नए सांचे में ढालता दिखता है, बल्कि चीन, ताइवान और यूरोप जैसे क्षेत्रों के लिए अनिश्चितता भी पैदा करता है। क्या यह वास्तव में जिनपिंग से कोई मौन समझौता है या केवल दबाव की रणनीति—यह आने वाले घटनाक्रम तय करेंगे। फिलहाल इतना साफ है कि ट्रंप का हर बयान वैश्विक संतुलन को झकझोरने की ताकत रखता है।

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