वेनेजुएला में घुसा ‘अंकल सैम’: ट्रंप के दो कार्यकालों का उल्टा सफर
डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल की पहचान थी—अमेरिका फर्स्ट, सैनिकों की वापसी और समझौतों की भाषा। लेकिन दूसरे कार्यकाल में वही ट्रंप सीधे सैन्य कार्रवाई, आर्थिक दबाव और सत्ता के प्रदर्शन पर उतर आए हैं। ईरान पर हमले से लेकर वेनेजुएला में राष्ट्रपति की गिरफ्तारी तक, ट्रंप का नया अवतार यह सवाल खड़ा करता है: क्या अमेरिका अब सिर्फ अपने हितों की रक्षा नहीं, बल्कि दूसरों के घर में घुसकर फैसला करने की नीति पर चल पड़ा है?
🌍 1. “अमेरिका फर्स्ट” की शुरुआत
पहला कार्यकाल: अलगाव की नीति और सीमित हस्तक्षेप
2017 में सत्ता संभालते समय ट्रंप का नारा साफ था—अमेरिका फर्स्ट। उन्होंने वैश्विक राजनीति में अमेरिका की भूमिका को सीमित करने का संकेत दिया। उद्देश्य था: विदेशी युद्धों से दूरी, घरेलू हितों को प्राथमिकता और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों में कटौती।
🪖 2. युद्ध से दूरी का संदेश
सीरिया और अफगानिस्तान से सैनिकों की वापसी
2018 में ट्रंप ने सीरिया से अमेरिकी सैनिकों को हटाने की घोषणा की, जिससे तत्कालीन रक्षा मंत्री जिम मैटिस ने इस्तीफा दे दिया। अफगानिस्तान में भी सैन्य उपस्थिति घटाई गई और 2020 में तालिबान के साथ समझौते के जरिए वापसी की प्रक्रिया तय हुई। ट्रंप का संदेश साफ था—अमेरिका अब दूसरों की जंग नहीं लड़ेगा।
☢️ 3. ईरान समझौते से बाहर, पर जंग से दूर
परमाणु डील तोड़ी, लेकिन सीधा सैन्य टकराव नहीं
2018 में अमेरिका ने ईरान परमाणु समझौते से खुद को अलग कर लिया। प्रतिबंध लगाए गए, दबाव बढ़ाया गया, लेकिन पहले कार्यकाल में ट्रंप ने खुली जंग से परहेज किया। यह नीति “दबाव के जरिए नियंत्रण” की थी, न कि सीधे हमले की।
✡️ 4. इज़रायल समर्थन: प्रतीकात्मक, निर्णायक नहीं
यरूशलम दूतावास और अब्राहम समझौते
ट्रंप ने यरूशलम को इज़रायल की राजधानी मान्यता दी और दूतावास वहां शिफ्ट किया। साथ ही अब्राहम समझौतों के जरिए अरब देशों और इज़रायल के बीच रिश्ते सामान्य करवाए। यह कूटनीतिक सफलता थी, लेकिन सैन्य आक्रामकता से दूर।
🔁 5. दोस्ती के संकेत: उत्तर कोरिया और रूस
कूटनीति के जरिए जोखिम कम करने की कोशिश
ट्रंप ने किम जोंग उन से मुलाकात की, रूस के प्रति नरम रुख दिखाया और यह जताया कि संवाद से संकट सुलझाया जा सकता है। कुल मिलाकर पहला कार्यकाल वैश्विक मंच से पीछे हटने की कहानी था।
🔥 दूसरा कार्यकाल: अमेरिका “आपके घर में”
⚡ 6. 2025 के बाद बदला रुख
अलगाव से आक्रामकता की ओर
दूसरे कार्यकाल में ट्रंप की विदेश नीति का चेहरा पूरी तरह बदल गया। व्यापार युद्ध से आगे बढ़ते हुए उन्होंने सैन्य ताकत को सीधे इस्तेमाल करना शुरू किया। अब अमेरिका केवल दबाव नहीं बनाता, बल्कि कार्रवाई करता है।
🚧 7. आव्रजन और सहयोगियों से टकराव
सीमा सख्त, रिश्ते सख्त
ट्रंप ने अवैध घुसपैठ पर सख्ती बढ़ाई और शरणार्थियों के लिए दरवाजे लगभग बंद कर दिए। टैरिफ को कूटनीतिक हथियार बनाया गया, जिससे भारत जैसे पारंपरिक साझेदारों के साथ भी तनाव बढ़ा।
🇺🇦 8. यूक्रेन युद्ध: वादे और असफलता
“24 घंटे में जंग खत्म” का दावा, पर जमीनी हकीकत अलग
ट्रंप ने दावा किया था कि वे सत्ता में आते ही रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म कर देंगे। एक साल बाद भी युद्ध जारी रहा। कभी पुतिन से नजदीकी, कभी ज़ेलेंस्की की सार्वजनिक आलोचना—कूटनीति के हर दांव आज़माए गए, लेकिन समाधान नहीं निकला।
💣 9. सात देशों पर सैन्य कार्रवाई
दूसरे कार्यकाल में सीधा हमला, न कि सिर्फ धमकी
एक साल के भीतर अमेरिका ने कई देशों में सैन्य हमले किए—ईराक, सीरिया, यमन, सोमालिया, नाइजीरिया और अन्य क्षेत्रों में। यह ट्रंप की नई रणनीति का संकेत था: “बोलो कम, मारो पहले।”
🇻🇪 10. वेनेजुएला ऑपरेशन: सबसे बड़ा झटका
तेल, ड्रग्स और सत्ता: सीधे हस्तक्षेप की मिसाल
ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला पर ड्रग्स तस्करी के आरोप लगाए और कैरेबियन में हवाई हमलों के जरिए कथित तस्कर नौकाओं को निशाना बनाया। अमेरिकी नौसेना ने तेल टैंकर जब्त किए। अंततः सेना भेजकर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में लेकर अमेरिका ले जाया गया। अब दोनों पर अमेरिकी अदालत में मुकदमा चल रहा है। यह कदम स्पष्ट करता है कि अमेरिका अब “दूरी बनाकर दबाव” नहीं, बल्कि “सीधा हस्तक्षेप” की नीति पर है।
☢️ 11. ईरान पर हमला: डील से युद्ध तक
परमाणु ठिकानों पर सीधी बमबारी
जहां पहले कार्यकाल में ट्रंप ने केवल समझौता तोड़ा था, वहीं दूसरे कार्यकाल में उन्होंने ईरान के प्रमुख परमाणु ठिकानों पर सैन्य हमला कराया। सार्वजनिक बयान में इसे “परमाणु खतरे को खत्म करने” की कार्रवाई बताया गया।
🏙️ 12. सेना अपने ही देश में
लॉस एंजिल्स में नेशनल गार्ड की तैनाती
विदेशों तक सीमित न रहते हुए ट्रंप ने घरेलू मोर्चे पर भी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल किया। आव्रजन विरोधी प्रदर्शनों के दौरान उन्होंने कैलिफोर्निया सरकार की आपत्ति के बावजूद नेशनल गार्ड और मरीन को सड़कों पर उतार दिया। नागरिक अधिकार आंदोलन के बाद यह पहली बार था जब संघीय सरकार ने गवर्नर की सहमति के बिना राज्य बलों को अपने नियंत्रण में लिया।
“अमेरिका फर्स्ट” से “अमेरिका हर जगह” तक
ट्रंप के दो कार्यकालों का अंतर केवल शैली का नहीं, नीति का है। पहले दौर में वे युद्धों से दूरी और समझौतों पर भरोसा करते दिखे। दूसरे दौर में उन्होंने सैन्य शक्ति, आर्थिक दबाव और प्रत्यक्ष हस्तक्षेप को प्राथमिक हथियार बना लिया। वेनेजुएला और ईरान इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं।
यह बदलाव बताता है कि ट्रंप की विदेश नीति अब केवल अमेरिकी हितों की रक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि उन हितों को लागू कराने के लिए सीधे कार्रवाई करने की सोच पर आधारित है। सवाल यह है कि क्या यह रणनीति अमेरिका को मजबूत बनाएगी या दुनिया को और अस्थिर?