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ट्रंप बनाम फेड: अमेरिकी केंद्रीय बैंक पर दबाव से क्यों उछला सोना-चांदी और भारत में भी बढ़ी कीमतें


अमेरिका की राजनीति और अर्थव्यवस्था के बीच टकराव अब खुले मोर्चे पर आ गया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार और अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के बीच बढ़ती तनातनी का असर सीधे वैश्विक बाजारों पर दिखने लगा है. जैसे ही फेड अध्यक्ष जेरोम पॉवेल ने न्याय विभाग से मिले सम्मन का खुलासा किया, सोना और चांदी की कीमतों में तेज उछाल आ गया. सवाल यह है कि अमेरिका की यह सियासी-आर्थिक जंग भारत के बाजारों को क्यों महंगा बना रही है?


🔹 क्या है ट्रंप सरकार और फेड के बीच नया टकराव?

फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने एक वीडियो संदेश में बताया कि अमेरिकी न्याय विभाग ने केंद्रीय बैंक को ग्रैंड जूरी के सामने पेश होने के लिए सम्मन जारी किया है. पॉवेल का कहना है कि यह कार्रवाई उनकी जून में दी गई सीनेट गवाही को लेकर की जा रही है, जिसमें उन्होंने फेड की बिल्डिंग के रेनोवेशन प्रोजेक्ट पर जवाब दिए थे.

पॉवेल के अनुसार, यह महज़ कानूनी प्रक्रिया नहीं बल्कि फेड पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश का हिस्सा है.


🔹 ब्याज दरों को लेकर क्यों आमने-सामने हैं ट्रंप और पॉवेल?

ट्रंप लंबे समय से चाहते हैं कि फेड आक्रामक तरीके से ब्याज दरों में कटौती करे ताकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को तेज़ी से बढ़ावा मिल सके. दूसरी ओर, पॉवेल का रुख है कि महंगाई और वित्तीय स्थिरता को देखते हुए जल्दबाज़ी खतरनाक हो सकती है.

पॉवेल ने साफ कहा कि फेड सरकार के दबाव में नहीं, बल्कि अपने स्वतंत्र आकलन के आधार पर फैसले लेता है. उनका आरोप है कि राष्ट्रपति प्रशासन उन्हें नीतिगत फैसलों के लिए कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर झुकाना चाहता है.


🔹 ट्रंप का जवाब: आरोपों से दूरी

एनबीसी न्यूज़ को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने किसी भी तरह के सम्मन की जानकारी से इनकार किया. हालांकि उन्होंने पॉवेल की कार्यशैली पर तंज कसते हुए कहा कि वे फेड चलाने और उसके प्रोजेक्ट्स संभालने में सक्षम नहीं हैं. यह बयान बताता है कि दोनों के बीच टकराव सिर्फ नीतियों तक सीमित नहीं, बल्कि सार्वजनिक बयानबाज़ी तक पहुंच चुका है.


🔹 अमेरिका का केंद्रीय बैंक क्यों तय करता है सोने-चांदी की दिशा?

फेडरल रिजर्व की नीतियां वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की धुरी मानी जाती हैं. जब फेड पर राजनीतिक दबाव बढ़ता है या उसकी स्वतंत्रता पर सवाल उठते हैं, तो डॉलर कमजोर पड़ने लगता है.

क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का कारोबार डॉलर में होता है, डॉलर कमजोर होते ही अन्य देशों के लिए सोना सस्ता हो जाता है. इससे मांग बढ़ती है और कीमतें ऊपर जाती हैं.


🔹 अनिश्चितता बढ़ी तो निवेशकों का रुख बदला

फेड की स्वायत्तता पर सवाल और अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम में संभावित हस्तक्षेप की आशंका से निवेशक जोखिम भरे एसेट्स जैसे शेयर बाजार से पैसा निकालने लगे. ऐसे माहौल में सोना और चांदी को सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है.

इसी कारण ट्रंप-फेड विवाद सामने आते ही कीमती धातुओं में जबरदस्त खरीदारी देखी गई.


🔹 कीमतों में ऐतिहासिक उछाल

पॉवेल द्वारा संभावित आपराधिक कार्रवाई की चेतावनी के बाद वैश्विक बाजारों में पहली बार सोना करीब 4,600 डॉलर प्रति औंस और चांदी 85 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच गई. यह स्तर बताता है कि निवेशक भविष्य की अनिश्चितता को लेकर कितने सतर्क हैं.


🔹 भारत में क्यों महंगा हुआ सोना-चांदी?

भारत अपनी ज़रूरत का अधिकांश सोना आयात करता है. अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ते ही आयात महंगा हो जाता है, जिसका सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है. इसके अलावा, जब वैश्विक निवेशक सुरक्षित संपत्तियों की ओर रुख करते हैं, तो भारतीय बाजारों में भी मांग बढ़ जाती है.

नतीजा: ज्वैलरी से लेकर निवेश तक, आम उपभोक्ता को ऊंची कीमत चुकानी पड़ती है.


🔹 सियासत बनाम मौद्रिक स्वतंत्रता का वैश्विक असर

यह विवाद सिर्फ ट्रंप और पॉवेल के बीच का मतभेद नहीं है, बल्कि केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्रता बनाम राजनीतिक नियंत्रण की बड़ी बहस है. अगर फेड पर सरकार का प्रभाव बढ़ता है, तो इससे दुनिया भर के निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है.

ऐसे हालात में सोना-चांदी जैसे सुरक्षित विकल्पों की मांग और तेज़ होगी, जिससे आने वाले समय में भी कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं.


अमेरिका की आंतरिक राजनीति अब वैश्विक बाजारों को सीधे प्रभावित कर रही है. ट्रंप और फेड के टकराव ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जब केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता पर सवाल उठते हैं, तो सबसे पहले फायदा सोने-चांदी को मिलता है और असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों के उपभोक्ताओं पर पड़ता है.

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