सुप्रीम कोर्ट की सख्ती—सेना में अनुशासन सर्वोपरि, धार्मिक बहाने नहीं चलेंगे
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय सेना के एक ईसाई अधिकारी की उस याचिका को कड़ी फटकार के साथ खारिज कर दिया, जिसमें उसने गुरुद्वारे में प्रवेश करने से धार्मिक आधार पर इनकार किया था। अदालत ने साफ कहा कि सेना की वर्दी पहनने के बाद अनुशासन और एकजुटता सबसे पहले आते हैं, और धार्मिक भावनाओं का गलत इस्तेमाल सेना की व्यवस्था को कमजोर कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने दी फटकार—धार्मिक आधार पर ड्यूटी से इनकार स्वीकार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेना में अनुशासन सबसे बड़ी प्राथमिकता है और धार्मिक कारणों का हवाला देकर कर्तव्य से पीछे हटना किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अधिकारी ने गुरुद्वारे के अंदर प्रवेश से इनकार करते हुए कहा था कि यह उसके ईसाई धर्म के खिलाफ है। अदालत ने इस दलील को “अतार्किक” और “सेना की व्यवस्था को चुनौती” बताकर खारिज किया।
जस्टिस बागची का सवाल—ईसाई धर्म में गुरुद्वारे में प्रवेश वर्जित कहां?
सुनवाई के दौरान जस्टिस ज्योत्सना रेढ्डी बागची ने अधिकारी से कड़ा प्रश्न किया—
“अनुच्छेद 25 केवल आवश्यक धार्मिक प्रथाओं की रक्षा करता है, हर भावना की नहीं। ईसाई धर्म में गुरुद्वारे में प्रवेश निषिद्ध कहां है?”
अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, परंतु यह स्वतंत्रता सेना जैसी संस्थाओं के अनुशासन से ऊपर नहीं रखी जा सकती।
अधिकारी की दलील—’अनुच्छेद 25 का अधिकार छीना गया’
अधिकारी के वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि यूनिफॉर्म पहनने के बावजूद व्यक्ति के मौलिक अधिकार खत्म नहीं हो जाते और धार्मिक स्वतंत्रता को रोका नहीं जा सकता।
लेकिन कोर्ट ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा कि सेना में कर्तव्य और आदेश सर्वोपरि हैं, और धार्मिक मान्यताओं के नाम पर असहयोग या अस्वीकृति स्वीकार्य नहीं।
सुप्रीम कोर्ट—सेना एक संस्था है, धर्म नहीं; आदेश मानना ही उसका आधार
कोर्ट ने यह भी कहा कि सेना किसी एक धर्म की नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।
ऐसे में किसी भी अधिकारी को यह अधिकार नहीं कि वह धार्मिक कारणों से किसी सैन्य कार्यक्रम, समारोह या अभ्यास से खुद को अलग करे।
अदालत ने चेतावनी भरे स्वर में कहा—“यदि हर कोई निजी धार्मिक भावनाओं के आधार पर आदेश मानने से मना करेगा, तो सेना का ढांचा ही ढह जाएगा।”
फैसला बरकरार—कार्यवाही सही, अधिकारी की याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने सेना द्वारा अधिकारी के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को सही ठहराया और कहा कि यह कदम सेना की एकजुटता और कार्य क्षमता को बनाए रखने के लिए आवश्यक था।
कोर्ट ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि सेना में सेवा करते समय व्यक्तिगत धार्मिक भावनाओं को पेशेवर कर्तव्य से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय सेना में “धर्म” नहीं, कर्तव्य, अनुशासन और राष्ट्रहित सर्वोपरि हैं।
धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान है, लेकिन उस स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर सैन्य आदेशों को ठुकराने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती।