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सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता, केंद्र से हिरासत पर पुनर्विचार का संकेतमेडिकल आधार पर राहत की संभावना, केंद्र सरकार से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की खराब होती सेहत को लेकर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने मौखिक रूप से केंद्र सरकार से कहा है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत जारी उनकी निवारक हिरासत पर मेडिकल आधार पर फिर से विचार करे।

यह टिप्पणी जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ ने की, जो वांगचुक की पत्नी डॉ. गीतांजलि आंगमो द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

NSA के तहत हिरासत को बताया गया अवैध

याचिका में 1980 के राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत सोनम वांगचुक की हिरासत को अवैध बताया गया है। वांगचुक को 26 सितंबर को हिरासत में लिया गया था। आरोप है कि लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के हिंसक हो जाने के बाद उन्हें जोधपुर स्थानांतरित किया गया।

कोर्ट ने केंद्र से पूछा—क्या अब हिरासत जरूरी है?

सुनवाई के दौरान जस्टिस पी.बी. वराले ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज से सवाल किया कि क्या सरकार वांगचुक की हिरासत जारी रखने की आवश्यकता पर पुनर्विचार कर सकती है, खासकर तब जब उनकी सेहत लगातार गिर रही है।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पहले पेश की गई मेडिकल रिपोर्ट में वांगचुक की स्थिति को “अच्छा नहीं” बताया गया था और उनकी उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं भी सामने आई हैं।

पेट दर्द की शिकायत, विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच के आदेश

डॉ. गीतांजलि आंगमो ने कोर्ट में आवेदन देकर बताया कि सोनम वांगचुक को लगातार पेट दर्द की शिकायत है। कोर्ट ने इस आवेदन को स्वीकार किया था और पिछली सुनवाई में मेडिकल रिपोर्ट भी रिकॉर्ड पर ली गई थी।

केंद्र का पक्ष: भाषण से भड़के हिंसक प्रदर्शन

एएसजी के.एम. नटराज ने दलील दी कि वांगचुक का 24 सितंबर का भाषण अत्यंत भड़काऊ था, जिसके चलते हिंसक प्रदर्शन हुए। उनके अनुसार, इन घटनाओं में चार लोगों की मौत हुई और 161 लोग घायल हुए।

नटराज ने कहा कि NSA के तहत किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के लिए उसका प्रत्यक्ष रूप से हिंसा में शामिल होना आवश्यक नहीं है, बल्कि यदि उसकी प्रवृत्ति लोगों को उकसाने वाली हो, तो वह भी निवारक हिरासत के लिए पर्याप्त आधार है।

कोर्ट की टिप्पणी: पांच महीने की हिरासत और खराब सेहत पर सवाल

जस्टिस वराले ने कहा कि हिरासत आदेश को लगभग पांच महीने हो चुके हैं और इस अवधि में वांगचुक की सेहत में कोई सुधार नहीं हुआ है। कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि क्या इस मानवीय पहलू को देखते हुए सरकार अपने फैसले पर दोबारा विचार कर सकती है।

जस्टिस अरविंद कुमार ने भी इस टिप्पणी से सहमति जताई। इस पर नटराज ने कहा कि यह सरकार के लिए भी चिंता का विषय है और वह इस संबंध में निर्देश लेंगे।

हिरासत आदेशों को चुनौती न देने पर केंद्र का तर्क

केंद्र सरकार ने यह भी दलील दी कि वांगचुक ने न तो राज्य सरकार द्वारा हिरासत की मंजूरी को चुनौती दी और न ही सलाहकार बोर्ड के आदेश को। नटराज ने बताया कि NSA के तहत हिरासत आदेश कई स्तरों पर जांच के बाद लागू होता है, ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके।

कोर्ट का रुख: मूल हिरासत आदेश ही चुनौती के केंद्र में

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि मूल हिरासत आदेश ही अवैध पाया जाता है, तो बाद के सभी आदेश स्वतः निरस्त हो सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि याचिका का मुख्य आधार हिरासत आदेश में विवेक के सही उपयोग की कमी है।

SSP की सिफारिश पर ‘कॉपी-पेस्ट’ का आरोप

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि जिला मजिस्ट्रेट ने हिरासत आदेश पारित करते समय स्वतंत्र रूप से दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया और केवल SSP की सिफारिश को शब्दशः दोहरा दिया।

कोर्ट ने केंद्र से सभी मूल रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश दिया है, जिनमें SSP की सिफारिश भी शामिल है।

संवेदनशील क्षेत्र और ‘जनरेशन-Z आंदोलन’ का हवाला

इससे पहले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया था कि वांगचुक एक संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में “दंगे जैसी स्थिति” पैदा करना चाहते थे। उन्होंने आरोप लगाया कि वांगचुक ने नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों के आंदोलनों से प्रेरित होकर युवाओं को भड़काने की कोशिश की।

मामले की अगली सुनवाई का इंतजार

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया है कि वह सभी संबंधित दस्तावेज़ और रिकॉर्ड अगली सुनवाई में पेश करे। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि वांगचुक की सेहत और हिरासत की आवश्यकता—दोनों पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।

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