खिलजी, गजनवी से औरंगज़ेब तक… सोमनाथ मंदिर पर कब-कब और कैसे हुए हमले
गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय आस्था, संस्कृति और पुनर्निर्माण की अद्भुत गाथा है। हजारों साल पुराने इस ज्योतिर्लिंग पर इतिहास के अलग-अलग दौर में कई हमले हुए, लेकिन हर बार यह पहले से अधिक भव्य रूप में खड़ा हुआ। आज जब महमूद गजनवी के आक्रमण के एक हजार वर्ष पूरे हो रहे हैं, तो आइए जानते हैं सोमनाथ की पूरी कहानी।
🛕 1. सोमनाथ: आस्था और प्राचीनता का प्रतीक
सोमनाथ मंदिर गुजरात के गिर सोमनाथ जिले के वेरावल (प्रभास पाटन) में स्थित है। यह भगवान शिव के सबसे प्राचीन ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इसकी स्थापना 1100–1500 वर्ष पहले मानी जाती है और यह हिंदुओं के प्रमुख तीर्थस्थलों में गिना जाता है।
🏛️ 2. बार-बार पुनर्निर्माण की परंपरा
इतिहास में जब-जब सोमनाथ पर हमला हुआ, चालुक्य, प्रतिहार और चूड़ासमा जैसे राजवंशों ने इसके पुनरोद्धार का कार्य कराया। यही कारण है कि यह मंदिर विनाश के बाद भी बार-बार खड़ा होता रहा और आस्था का केंद्र बना रहा।
⚔️ 3. पहला बड़ा आक्रमण: अल-जुनैद (725 ई.)
सिंध के अरब गवर्नर अल-जुनैद ने 725 ईस्वी में सोमनाथ पर पहला बड़ा आक्रमण किया। इस हमले में मंदिर को लूटा गया और काफी नुकसान पहुंचाया गया। इसके बाद 815 ईस्वी में राजा नागभट्ट द्वितीय ने लाल पत्थर से मंदिर का पुनर्निर्माण कराया।
🔥 4. महमूद गजनवी का आक्रमण (1025-26 ई.)
सोमनाथ के इतिहास में सबसे चर्चित हमला महमूद गजनवी द्वारा 1025-26 ईस्वी में किया गया। गजनवी ने मंदिर का खजाना लूटा, ज्योतिर्लिंग को खंडित किया और व्यापक तबाही मचाई। यह आक्रमण भारतीय इतिहास के सबसे निर्णायक क्षणों में गिना जाता है।
🗡️ 5. खिलजी काल: 1299 ई.
अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति उलुग खान और नुसरत खान ने 1299 ईस्वी में गुजरात विजय के दौरान सोमनाथ को फिर से निशाना बनाया। मंदिर को तोड़ा गया और लूटपाट की गई।
🏴 6. गुजरात सल्तनत के हमले: 1395 और 1451
दिल्ली सल्तनत के गवर्नर (बाद में गुजरात सल्तनत के सुल्तान) जफर खान ने 1395 ईस्वी में मंदिर को नुकसान पहुंचाया। इसके बाद सुल्तान महमूद बेगड़ा ने 1451 ईस्वी में सोमनाथ पर आक्रमण कर इसे अपवित्र किया।
⚔️ 7. औरंगज़ेब का आदेश (1665 और 1706)
मुगल बादशाह औरंगज़ेब ने 1665 ईस्वी में सोमनाथ को गिराने का आदेश दिया और बाद में 1706 में दोबारा कठोर सैन्य कार्रवाई कर वहां पूजा रोकने की कोशिश की। इसके बावजूद स्थानीय आस्था समाप्त नहीं हुई।
🌙 8. पहला ज्योतिर्लिंग और पौराणिक मान्यता
मान्यता है कि चंद्रदेव ने प्रभास तीर्थ पर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और श्राप से मुक्ति पाई। इसी कारण यह स्थान सोमनाथ (चंद्र के स्वामी) कहलाया। यह भी माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण की अंतिम यात्रा इसी भूमि से जुड़ी है।
🏗️ 9. मंदिर की स्थापत्य विशेषताएं
वर्तमान मंदिर कैलाश महामेरु प्रसाद शैली में बना है।
- शिखर: लगभग 155 फीट ऊंचा
- कलश: लगभग 10 टन वजनी
- ध्वजदंड: 27 फीट ऊंचा
गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप इसकी प्रमुख संरचनाएं हैं। महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा जीर्णोद्धार किया गया मंदिर भी मुख्य परिसर के पास स्थित है।
🇮🇳 10. स्वतंत्र भारत में पुनर्निर्माण
आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प सरदार वल्लभभाई पटेल ने लिया। 13 नवंबर 1947 को उन्होंने घोषणा की—“मंदिर यहीं बनेगा।”
11 मई 1951 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने यहां प्राण-प्रतिष्ठा की। यह आयोजन आधुनिक भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बना।
🧘 11. स्वामी विवेकानंद का संदेश
1890 के दशक में सोमनाथ दर्शन के बाद स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि यह मंदिर हमें सिखाता है कि कैसे कोई सभ्यता बार-बार टूटकर भी फिर से उठ खड़ी होती है—पहले से अधिक मजबूत होकर। यही राष्ट्रीय चेतना की धारा है।
🧭 12. दक्षिण ध्रुव से जुड़ा रहस्य
सोमनाथ का तीर्थ स्तंभ (तीर) दक्षिण ध्रुव की दिशा की ओर संकेत करता है। दक्षिण ध्रुव की ओर निकटतम भूमि लगभग 9936 किमी दूर मानी जाती है। इसे प्राचीन भारतीय भूगोल और खगोलीय ज्ञान का अद्भुत संकेतक माना जाता है।
🕉️ 13. भगवान कृष्ण से संबंध
सोमनाथ के पास स्थित भालका तीर्थ वह स्थान माना जाता है जहां भगवान श्रीकृष्ण को शिकारी का तीर लगा था। इसके बाद वे हिरन, कपिला और सरस्वती नदियों के संगम से होते हुए अपनी दिव्य यात्रा पर निकले—इस कारण यह क्षेत्र अत्यंत पवित्र माना जाता है।
📜 14. पौराणिक इतिहास और ‘चंद्रमा का मंदिर’
परंपराओं के अनुसार, चंद्रदेव ने सोने का मंदिर बनवाया, रावण ने चांदी का और माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने चंदन की लकड़ी से मंदिर का निर्माण कराया। शास्त्रीय ग्रंथों में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा का उल्लेख त्रेता युग से जोड़ा जाता है।
📌 15. क्यों अमर है सोमनाथ?
तीन बड़े तथ्य सामने आते हैं—
- आस्था की ताकत: बार-बार विनाश के बावजूद मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ।
- सांस्कृतिक पहचान: सोमनाथ केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि ऐतिहासिक-सांस्कृतिक धरोहर है।
- राजनीतिक-ऐतिहासिक संदर्भ: हर आक्रमण अपने दौर की सत्ता और संघर्षों को दर्शाता है, पर मंदिर का अस्तित्व जनआस्था से जुड़ा रहा।
सोमनाथ मंदिर इतिहास, आस्था और पुनर्जन्म की अद्भुत मिसाल है।
गजनवी, खिलजी और औरंगज़ेब जैसे शासकों के दौर में भी यह पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। हर बार टूटकर फिर खड़ा होना—यही सोमनाथ की असली पहचान है, जो भारत की सांस्कृतिक आत्मा को प्रतिबिंबित करती है।