शशि थरूर ने ठुकराया ‘वीर सावरकर इंटरनेशनल इम्पैक्ट अवॉर्ड 2025’, आयोजकों पर सहमति बिना नाम घोषित करने का आरोप
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता Shashi Tharoor को Veer Savarkar International Impact Award 2025 से नामित किये जाने की खबर सुनकर राजनीति में हलचल मच गई। इस सम्मान-समारोह में Rajnath Singh के शामिल होने की शुरुआत में उम्मीद जताई गई थी, लेकिन जैसे-तैसे जारी किए गए नामांकन के बाद थरूर ने खुद इस अवॉर्ड को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया, जिसके बाद पूरे मसले ने नया मोड़ ले लिया है। इस खबर में हम संपूर्ण घटनाक्रम, विवाद और राजनीतिक मायने समझने की कोशिश करेंगे।
नामांकन की घोषणा और समारोह: शुरुआत में उत्साह
HRDS इंडिया नामक एनजीओ ने 2025 के अवॉर्ड के लिए कुल 6 लोगों को फर्स्ट राउंड में चयनित किया, जिसमें शशि थरूर का नाम भी शामिल था।
अवॉर्ड समारोह निर्धारित था कि दिल्ली के NDMC कन्वेंशन हॉल में आयोजित किया जाएगा,www.ndtv.com जिसका उद्घाटन रक्षामंत्री राजनाथ सिंह करेंगे।
आयोजकों ने थरूर की “राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव” को देखते हुए उन्हें अवॉर्ड के लिए चुना था।
शशि थरूर ने क्यों ठुकराया अवॉर्ड: असहमति और प्रक्रिया पर सवाल
थरूर ने बुधवार को स्पष्ट किया कि उन्होंने न तो अवॉर्ड स्वीकार किया है, न ही समारोह में भाग लेने का निर्णय लिया है।
उन्होंने कहा कि उन्हें नामांकन की जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स के माध्यम से मिली; उन्हें इस सम्मान के लिए अपनी सहमति नहीं दी गई थी।
थरूर ने आयोजकों की तीखी kriti की कि यह “गैर-जिम्मेदाराना” था कि बिना उनकी सहमति के उनका नाम सार्वजनिक कर दिया गया।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफार्म X पर एक पोस्ट में कहा — “इस अवॉर्ड की प्रकृति, सम्मान देने वाली संस्था या अन्य प्रासंगिक जानकारी के बिना, मेरी भागीदारी या इसे स्वीकारना असंभव है।
पार्टी की प्रतिक्रिया और राजनीतिक पृष्ठभूमि: विवाद गहरा हुआ
इस मुद्दे पर, पार्टी के अन्य वरिष्ठ सदस्य K Muraleedharan ने कहा कि किसी भी कांग्रेस नेता को ऐसे अवॉर्ड को स्वीकार नहीं करना चाहिए — ऐसा करना पार्टी के लिए “अपमान” होगा। उन्होंने कहा कि जिन सामाजिक-राजनीतिक विचारों से जुड़ा नाम है — उसके सम्मान को ग्रहण करना कांग्रेस की विचारधारा के खिलाफ होगा।
आयोजकों की ओर से, उन्होंने दावा किया कि उन्होंने पहले ही थरूर से संपर्क किया था, उन्हें आमंत्रित किया गया था और अवॉर्ड की सूची भेजी गयी थी। उनका कहना है कि शायद थरूर “दबाव के कारण” पीछे हटे।
इस पूरी घटना ने एक बार फिर से भारत में इतिहास-राजनीति, स्वतंत्रता-संग्राम के आंकलन, और राजनीतिक दलों की विचारधारा की दीवारों को उजागर कर दिया है। उन नामों पर अवॉर्ड देना या लेना, जिसे इतिहास और प्रतिष्ठा के विवाद से जोड़ा गया हो, आज भी राजनीतिक विभाजन को गहरा करता है।