26 जनवरी परेड में शामिल जवानों को देने होते हैं ये खास टेस्ट, हथियारों की होती है कड़ी जांच
26 जनवरी की गणतंत्र दिवस परेड सिर्फ एक समारोह नहीं, बल्कि भारत की सैन्य शक्ति, अनुशासन और सुरक्षा व्यवस्था का भव्य प्रदर्शन होती है। इस परेड में शामिल होना हर जवान के लिए गौरव की बात होती है, लेकिन फाइनल परेड तक पहुंचने से पहले उन्हें महीनों की ट्रेनिंग, सख्त सुरक्षा जांच और कई स्तर के टेस्ट से गुजरना पड़ता है।
🇮🇳 77वां गणतंत्र दिवस: परंपरा और शक्ति का संगम
हर साल 26 जनवरी को भारत अपना गणतंत्र दिवस मनाता है। इसी दिन 1950 में संविधान लागू हुआ था। साल 2026 में देश 77वां गणतंत्र दिवस मनाएगा। इस अवसर पर राष्ट्रपति राष्ट्र को संबोधित करते हैं और कर्तव्य पथ पर होने वाली परेड भारत की सैन्य और सांस्कृतिक ताकत को दुनिया के सामने रखती है।
गणतंत्र दिवस परेड भारत की सॉफ्ट पावर और सैन्य तैयारियों का अंतरराष्ट्रीय मंच है, जहां हर छोटी-बड़ी गतिविधि वैश्विक नजरों में होती है।
🛡️ परेड की जिम्मेदारी किसके पास होती है
गणतंत्र दिवस परेड का पूरा आयोजन रक्षा मंत्रालय की निगरानी में होता है। भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना के साथ कई अन्य सुरक्षा और सरकारी एजेंसियां इसमें सहयोग करती हैं। परेड की टाइमिंग और मूवमेंट सेकेंड-टू-सेकेंड तय होती है।
इतने बड़े आयोजन में समय और अनुशासन सबसे अहम होते हैं, जहां एक सेकेंड की देरी भी बड़ी चूक मानी जाती है।
🎖️ परेड की शुरुआत कैसे होती है
26 जनवरी की सुबह राष्ट्रपति के कर्तव्य पथ पर पहुंचते ही परेड की औपचारिक शुरुआत होती है। राष्ट्रपति के अंगरक्षक राष्ट्रीय ध्वज को सलामी देते हैं, राष्ट्रगान बजता है और 21 तोपों की सलामी दी जाती है।
दिलचस्प बात यह है कि यह सलामी 21 तोपों से नहीं, बल्कि 7 तोपों से तीन राउंड में दी जाती है।
यह सैन्य परंपराओं और तकनीकी सटीकता का बेहतरीन उदाहरण है।
⏱️ जवानों की तैयारी महीनों पहले शुरू होती है
परेड में शामिल होने वाले जवानों की ट्रेनिंग जुलाई से ही शुरू हो जाती है।
- पहले रेजिमेंट सेंटर में रिहर्सल
- दिसंबर तक दिल्ली में फुल-ड्रेस अभ्यास
- हर जवान लगभग 600 घंटे की ट्रेनिंग पूरी करता है
परेड के दिन जवान रात 2 बजे तक तैयार हो जाते हैं और सुबह 3 बजे तक कर्तव्य पथ पर पहुंच जाते हैं।
यह ट्रेनिंग सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक अनुशासन और तालमेल की भी परीक्षा होती है।
🚛 झांकियों और मार्च की सटीक रफ्तार
परेड में शामिल झांकियां लगभग 5 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती हैं, ताकि दर्शक हर विवरण देख सकें।
झांकी के ड्राइवर बहुत छोटी खिड़की से वाहन चलाते हैं, जिससे ड्राइविंग बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
यह दिखाता है कि परेड सिर्फ प्रदर्शन नहीं, बल्कि हाई-प्रिसिजन ऑपरेशन है।
🔍 जवानों को देने होते हैं चार स्तर के सुरक्षा टेस्ट
परेड में शामिल हर जवान को चार स्तर की सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता है।
- पहचान सत्यापन
- बैकग्राउंड और सर्विस रिकॉर्ड जांच
- फिजिकल और मेंटल फिटनेस
- हथियारों की पूरी जांच
यह सुनिश्चित किया जाता है कि कोई भी हथियार लाइव गोलियों से लोड न हो।
यह सुरक्षा व्यवस्था किसी भी संभावित खतरे को शून्य करने के लिए जरूरी होती है।
🪖 हथियार और सैन्य उपकरणों की सख्त जांच
टैंक, तोप, बख्तरबंद वाहन और अन्य सैन्य उपकरणों के लिए इंडिया गेट के पास अलग कैंप लगाया जाता है।
- तकनीकी जांच
- सफाई और मेंटेनेंस
- ट्रायल रन
रिहर्सल के दौरान जवान करीब 12 किलोमीटर मार्च करते हैं, जबकि परेड के दिन यह दूरी लगभग 9 किलोमीटर होती है।
🏆 200 फैक्टर्स पर होता है मूल्यांकन
पूरे रास्ते में जज बैठे होते हैं, जो करीब 200 अलग-अलग फैक्टर्स पर हर टुकड़ी का मूल्यांकन करते हैं।
इन्हीं अंकों के आधार पर बेस्ट मार्चिंग टुकड़ी का चयन किया जाता है।
यह प्रतिस्पर्धा जवानों को और बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरित करती है।