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रिलायंस इंडस्ट्रीज का बड़ा कदम: यूरोपीय प्रतिबंधों के बाद रूस से कच्चे तेल खरीद पूरी तरह बंद…

यूरोपीय संघ की नई पाबंदियों और रूस पर बढ़ते वैश्विक दबाव के बीच रिलायंस इंडस्ट्रीज ने 20 नवंबर से रूसी कच्चे तेल की खरीद पूरी तरह रोक दी है। जामनगर स्थित निर्यात-आधारित रिफाइनरी के लिए रूस से आने वाला क्रूड अब बिल्कुल नहीं लिया जाएगा, ताकि वैश्विक नियमों का पालन किया जा सके।

जामनगर की निर्यात यूनिट में रूसी तेल का उपयोग अब बंद

रिलायंस ने घोषणा की कि उसकी SEZ वाली रिफाइनिंग यूनिट, जो यूरोप, अमेरिका और अन्य देशों को पेट्रोल-डीजल सप्लाई करती है, अब रूस से कोई कच्चा तेल नहीं खरीदेगी। यह निर्णय यूरोपीय संघ की कठोर पाबंदियों को देखते हुए लिया गया।

रूस पर अमेरिका–यूरोप का दोहरा दबाव

रूस की तेल कमाई कम करने के लिए अमेरिका और यूरोप दोनों ही देशों ने नए प्रतिबंध लागू किए हैं। इन पाबंदियों का सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ रहा है जो रूसी तेल को खरीदकर उसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचती हैं।

भारत में रूसी तेल की सबसे बड़ी खरीदार रही है रिलायंस

रिलायंस अब तक भारत में रूसी कच्चे तेल की सबसे बड़ी खरीदार रही है। जामनगर के विशाल रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स में दो यूनिट हैं—

>SEZ यूनिट (निर्यात के लिए)

>पुरानी यूनिट (घरेलू बाजार के लिए)

>इन्हीं में से निर्यात वाली यूनिट पर नया नियम लागू किया गया है।

>SEZ यूनिट का निर्णय—यूरोपीय नियमों के प्रति अनुपालन

यूरोपीय संघ ने हाल ही में रूसी तेल से बने ईंधन की खरीद-बिक्री पर रोक लगाई है। चूंकि रिलायंस अपनी SEZ यूनिट से यूरोप और अमेरिका को ईंधन भेजती है, इसलिए कंपनी ने जोखिम से बचते हुए रूसी तेल की सप्लाई रोक दी।

अमेरिका की कार्रवाई ने भी बढ़ाया दबाव

अमेरिका ने रूस की दो प्रमुख तेल कंपनियों पर कड़े कदम उठाए हैं। इसका असर उन रिफाइनरियों पर पड़ा है जो रूसी तेल से बने उत्पाद वैश्विक बाजारों में भेजती हैं। बदलते माहौल में रिलायंस ने सावधानी भरा रुख अपनाने का फैसला किया।

घरेलू बाजार के लिए रिफाइनिंग पहले की तरह जारी रहेगी

कंपनी की पुरानी यूनिट, जो भारत के लिए पेट्रोल और डीजल बनाती है, अपने मौजूदा स्रोतों से उत्पादन जारी रखेगी।
हालांकि, रूस से खरीद बंद होने का असर आगे चलकर सप्लाई और वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ सकता है।

वैश्विक तेल बाजार पर दिख सकता है निर्णय का असर

रूस से आयात रोकने का यह कदम अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की दिशा को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय भारत के लिए सप्लाई चेन में बदलाव ला सकता है, और वैश्विक बाजार में दामों की परिशानी बढ़ सकती है।

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