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जर्जर स्कूलों पर सख्त हुआ राजस्थान हाई कोर्ट, बजट को बताया ‘ऊंट के मुंह में जीरा’

राजस्थान में जर्जर स्कूल भवनों और बच्चों की सुरक्षा को लेकर चल रही सुनवाई में हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के बजटीय प्रावधानों पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि स्कूलों के पुनर्निर्माण और मरम्मत के लिए जहां लगभग 20 हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता है, वहां मौजूदा प्रावधान बेहद कम हैं।


झालावाड़ हादसे के बाद कोर्ट का स्वत: संज्ञान

जुलाई 2025 में झालावाड़ में हुए स्कूल हादसे के बाद यह मामला न्यायालय तक पहुंचा। बच्चों की सुरक्षा को गंभीर मुद्दा मानते हुए Rajasthan High Court ने स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई शुरू की थी।

खंडपीठ में न्यायमूर्ति अशोक कुमार जैन और न्यायमूर्ति महेंद्र गोयल इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं।


बजट प्रावधान पर क्या बताया सरकार ने?

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद ने अदालत को जानकारी दी कि:

  • 550 करोड़ रुपये – पुराने स्कूल भवनों की मरम्मत के लिए
  • 450 करोड़ रुपये – नए भवनों के निर्माण के लिए
  • 200 करोड़ रुपये – लैब निर्माण के लिए

सरकार ने यह भी कहा कि भामाशाह सहित अन्य योजनाओं से अतिरिक्त संसाधन जुटाने की कोशिश की जा रही है।


कोर्ट की तीखी टिप्पणी: ‘ऊंट के मुंह में जीरा’

एनसीपीसीआर की ओर से पैरवी कर रहे एडवोकेट वागीश सिंह ने अदालत को अवगत कराया कि राज्यभर में जर्जर स्कूलों के कायाकल्प के लिए करीब 20 हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता है।

इस पर अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब जरूरत इतनी बड़ी है, तब मौजूदा बजट प्रावधान “ऊंट के मुंह में जीरा” के समान हैं। अदालत ने यह भी कहा कि 2 हजार करोड़ रुपये भी प्रभावी रूप से जुटा पाना संभव नहीं दिख रहा है।


8 महीने में भी नहीं बना ठोस रोडमैप

कोर्ट ने सरकार के समग्र प्लान पर असंतोष जताया। न्यायालय ने कहा कि पिछले आठ महीनों से मामला लंबित है, लेकिन बार-बार निर्देशों के बावजूद अब तक कोई स्पष्ट और व्यापक रोडमैप पेश नहीं किया गया है।

अदालत ने यह भी पूछा कि दान और अन्य योजनाओं से मिलने वाले फंड का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए हो रहा है या नहीं, इसकी मॉनिटरिंग कैसे सुनिश्चित की जाएगी।


मॉनिटरिंग कमेटी पर विचार, 5 मार्च को अगली सुनवाई

कोर्ट ने संकेत दिया कि फंड के उपयोग की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र कमेटी गठित करने पर विचार किया जा सकता है। सभी पक्षकारों से सुझाव मांगे गए हैं कि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए क्या ठोस व्यवस्था की जाए।

मामले की अगली सुनवाई 5 मार्च को निर्धारित की गई है।


बच्चों की सुरक्षा बनाम सीमित संसाधन

यह मामला केवल बजट का नहीं, बल्कि राज्य में सरकारी स्कूलों की बुनियादी संरचना और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा है। हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणियां यह संकेत देती हैं कि न्यायपालिका इस मुद्दे को प्राथमिकता के तौर पर देख रही है।

सरकार के सामने अब चुनौती दोहरी है—एक ओर संसाधनों की व्यवस्था और दूसरी ओर समयबद्ध व पारदर्शी कार्ययोजना पेश करना। आने वाली सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि क्या राज्य सरकार अदालत की अपेक्षाओं पर खरी उतर पाती है या नहीं।

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