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राजस्थान कांग्रेस में खुली बगावत: आलाकमान की साख पर संकट जयपुर से दिल्ली तक सत्ता संघर्ष की गूंज

राजस्थान कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर रविवार को बड़ा सियासी टकराव सामने आया। जयपुर में प्रस्तावित विधायक दल की बैठक से पहले बड़ी संख्या में कांग्रेस विधायकों ने पार्टी आलाकमान के कथित फैसले का विरोध किया। घटनाक्रम के बाद प्रदेश की राजनीति में यह सवाल गहराया कि पार्टी नेतृत्व की रणनीति को ज़मीनी स्तर पर क्यों चुनौती मिल रही है।

विधायक दल बैठक और विरोध का घटनाक्रम

सूत्रों के अनुसार विधायक दल की बैठक में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर सहमति बनाने की तैयारी थी। योजना यह थी कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के इस्तीफे की पेशकश पर चर्चा हो और नए मुख्यमंत्री को लेकर आलाकमान की भूमिका तय हो।
लेकिन बैठक से पहले ही बड़ी संख्या में विधायकों के विरोध के चलते पूरी प्रक्रिया प्रभावित हुई और बैठक स्थगित करनी पड़ी।

नेतृत्व परिवर्तन की पटकथा क्यों अटकी

कांग्रेस नेतृत्व द्वारा तय मानी जा रही रणनीति को राजस्थान के भीतर अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। विरोध करने वाले विधायकों का तर्क था कि नेतृत्व परिवर्तन से सरकार और संगठन दोनों पर असर पड़ेगा। घटनाक्रम से स्पष्ट हुआ कि दिल्ली और जयपुर के राजनीतिक आकलन में बड़ा अंतर है।

पुराने सियासी टकरावों की याद

राजस्थान कांग्रेस के इतिहास में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर पहले भी असंतोष सामने आता रहा है। 70 और 80 के दशक में कई बार प्रदेश नेतृत्व को बदलने पर विधायकों ने नाराज़गी जताई थी। हालांकि उस दौर में पार्टी आलाकमान के फैसले अंततः लागू हो जाते थे। मौजूदा घटनाक्रम को उसी परंपरा की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन इस बार विरोध अधिक संगठित दिखाई दिया।

क्या यह गहलोत बनाम पायलट का संघर्ष है?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार मौजूदा विवाद को केवल सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच की व्यक्तिगत लड़ाई तक सीमित करना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। यह संघर्ष सत्ता संतुलन, संगठन पर पकड़ और आगामी चुनावी रणनीति से भी जुड़ा हुआ है।

आलाकमान की साख पर सवाल

घटनाक्रम के बाद पार्टी नेतृत्व की निर्णय क्षमता और संवाद प्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। खुले विरोध से यह संकेत गया कि संगठन के भीतर समन्वय की कमी है और प्रदेश नेतृत्व व केंद्रीय नेतृत्व के बीच भरोसे की खाई बढ़ी है।

आगामी चुनावों पर संभावित असर

राजस्थान में अगले विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं। पार्टी के भीतर जारी खींचतान से संगठनात्मक एकता कमजोर पड़ सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते मतभेद नहीं सुलझे, तो इसका सीधा असर चुनावी तैयारियों और मतदाताओं के संदेश पर पड़ेगा।

अगले 48 घंटे क्यों अहम

पार्टी नेतृत्व की ओर से बातचीत और सुलह के प्रयास किए जाने की संभावना है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा आलाकमान के सामने अपना पक्ष रखने के बाद आगे की रणनीति तय हो सकती है। आने वाले 48 घंटे राजस्थान कांग्रेस के लिए निर्णायक माने जा रहे हैं।

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