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जब ‘गाइड’ पर रो पड़े राज कपूर, लेकिन सामने आए विजय आनंद को पहचानने से कर दिया इनकार


भारतीय सिनेमा में राज कपूर की तारीफ किसी भी फिल्ममेकर के लिए सम्मान का सर्वोच्च प्रमाण मानी जाती थी। लेकिन देव आनंद के भाई और ‘गाइड’ के निर्देशक विजय आनंद उर्फ गोल्डी के साथ जो हुआ, वह तारीफ और तिरस्कार के अजीब विरोधाभास की कहानी है। एक तरफ राज कपूर ने फिल्म देखकर भावुक होकर आंसू बहाए, तो दूसरी तरफ आमने-सामने मिलने पर निर्देशक को पहचानने से ही इनकार कर दिया।


🟦 आधी रात आया शोमैन का फोन

यह किस्सा उस दौर का है जब ‘गाइड’ रिलीज होकर धीरे-धीरे क्लासिक का दर्जा पा रही थी। एक रात करीब 2 बजे देव आनंद के घर फोन बजा। कॉल करने वाले थे राज कपूर। नशे की हालत में उन्होंने ज़िद पकड़ ली कि उन्हें उसी वक्त ‘गाइड’ देखनी है। देव आनंद ने सुबह प्रिंट भिजवाने की बात कही, लेकिन राज कपूर किसी भी कीमत पर इंतज़ार को तैयार नहीं थे। आखिरकार देव आनंद को मजबूरी में रातों-रात फिल्म का प्रिंट आर.के. स्टूडियो भेजना पड़ा।


🟦 सुबह-सुबह छलके आंसू

करीब सुबह 6 बजे फिर फोन आया। इस बार आवाज में नशा नहीं, भावनाएं थीं। फिल्म देखकर राज कपूर बेहद भावुक हो चुके थे। उन्होंने देव आनंद से कहा कि वह कितने खुशकिस्मत हैं कि उनका भाई इतना बेहतरीन फिल्ममेकर है। फोन पर उनकी आंखें भर आईं। देव आनंद के लिए यह पल किसी बड़ी कामयाबी से कम नहीं था।


🟦 आमने-सामने बदला मिज़ाज

कुछ दिनों बाद एक सोशल गेदरिंग में देव आनंद ने अपने भाई विजय आनंद को राज कपूर से मिलने भेजा। लेकिन यहां कहानी ने चौंकाने वाला मोड़ ले लिया। राज कपूर ने विजय को पहचाना तक नहीं। उन्होंने सामान्य अंदाज़ में पूछा—“क्या करते हो? कहां पढ़ते हो?”
जब विजय ने बताया कि उन्होंने ही ‘गाइड’ बनाई है, तो राज कपूर का जवाब था—“अच्छा… देखेंगे।” यह सुनकर विजय अंदर से टूट गए।


🟦 दोहराया गया वही अपमान

बात यहीं खत्म नहीं हुई। कुछ समय बाद देव आनंद की बहन बोनी आनंद एक पूजा में गईं, जहां राज कपूर ने फिर ‘गाइड’ की जमकर तारीफ की। हिम्मत जुटाकर विजय उसी रात राज कपूर से मिलने उनके घर पहुंचे, लेकिन वहां भी वही सवाल दोहराए गए—जैसे वह उन्हें जानते ही न हों। यह पल विजय आनंद के लिए बेहद अपमानजनक और पीड़ादायक साबित हुआ।


🟦 ‘गाइड’ ने खुद लिखी पहचान

इन तमाम घटनाओं के बावजूद ‘गाइड’ ने इतिहास रच दिया। फिल्म ने कई बड़े पुरस्कार अपने नाम किए और वर्षों बाद कान फिल्म फेस्टिवल तक पहुंची। आज ‘गाइड’ को भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में गिना जाता है। समय ने साबित कर दिया कि पहचान किसी के इनकार से नहीं, बल्कि रचनात्मकता और मेहनत से बनती है। विजय आनंद का नाम भी इसी फिल्म के साथ हमेशा के लिए अमर हो गया।

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