स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव: राहुल गांधी ने क्यों नहीं किए हस्ताक्षर, कांग्रेस ने बताई संसदीय वजह…
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया जा चुका है, लेकिन इस प्रस्ताव पर नेता विपक्ष राहुल गांधी के हस्ताक्षर नहीं होने से राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कांग्रेस ने अब इसके पीछे की संसदीय परंपरा का हवाला देते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट की है।
118 सांसदों का समर्थन, सचिवालय को सौंपा गया नोटिस
विपक्षी दलों—कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके सहित अन्य सहयोगी दलों—के करीब 118 सांसदों ने स्पीकर को पद से हटाने के प्रस्ताव के नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं। यह नोटिस लोकसभा के महासचिव को औपचारिक रूप से सौंप दिया गया है, जिससे संसद के भीतर राजनीतिक गतिरोध और स्पष्ट हो गया है।
राहुल गांधी ने हस्ताक्षर क्यों नहीं किए?
कांग्रेस सूत्रों के अनुसार नेता विपक्ष का स्वयं स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करना संसदीय परंपराओं के लिहाज से उचित नहीं माना जाता। इसी कारण राहुल गांधी ने नोटिस का समर्थन होने के बावजूद उस पर अपने हस्ताक्षर नहीं किए। पार्टी का कहना है कि यह निर्णय प्रक्रिया की मर्यादा बनाए रखने के उद्देश्य से लिया गया।
नोटिस के बाद स्पीकर ने खुद को कार्यवाही से अलग किया
सूत्रों के मुताबिक नोटिस सौंपे जाने के बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने निष्पक्षता बनाए रखने के मद्देनज़र खुद को सदन की कार्यवाही के संचालन से अस्थायी रूप से अलग कर लिया। मंगलवार को वे आसन पर नहीं बैठे, जबकि सदन की कार्यवाही अन्य पीठासीन अधिकारियों ने संचालित की।
विपक्ष के आरोप: पक्षपात और बोलने का अवसर न मिलने का मुद्दा
अविश्वास प्रस्ताव में विपक्ष ने आरोप लगाया है कि सदन की कार्यवाही पक्षपातपूर्ण ढंग से चलाई जा रही है। प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि 2 फरवरी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान राहुल गांधी को अपना पूरा संबोधन देने का अवसर नहीं मिला।
निलंबन और विवादित टिप्पणी का भी उल्लेख
नोटिस में 3 फरवरी को आठ विपक्षी सांसदों के निलंबन को मनमाना बताया गया है। साथ ही 4 फरवरी की एक घटना का भी हवाला दिया गया है, जिसमें विपक्ष के अनुसार एक सत्तापक्ष सांसद की आपत्तिजनक टिप्पणी पर चेयर द्वारा तत्काल कार्रवाई नहीं की गई।
राजनीतिक संदेश और संसदीय परंपरा के बीच संतुलन
विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी का हस्ताक्षर न करना विपक्ष के राजनीतिक विरोध को कमजोर नहीं करता, बल्कि संसदीय परंपराओं का पालन दिखाने की रणनीति भी हो सकती है। इससे विपक्ष एक तरफ संस्थागत प्रक्रिया का सम्मान जताता है, तो दूसरी ओर स्पीकर की कार्यशैली पर सवाल उठाने का संदेश भी देता है।