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निशुल्क तीर्थ यात्रा योजना पर सवाल: जयपुर बुलाकर लौटाए गए 150 वृद्ध यात्री, देवस्थान विभाग की लापरवाही उजागर…

अलवर जिले में एक ओर राजस्थान सरकार अपने कार्यकाल के दो वर्ष पूरे होने का जश्न मना रही है, वहीं दूसरी ओर सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत आमजन, खासकर वृद्धजनों के लिए परेशानी का कारण बन रही है। देवस्थान विभाग की निशुल्क तीर्थ यात्रा योजना एक बार फिर विवादों में आ गई है, जहां करीब डेढ़ सौ वृद्ध यात्रियों को जयपुर बुलाकर यह कहकर वापस भेज दिया गया कि ट्रेन की सभी सीटें फुल हो चुकी हैं।

पीड़ितों का आरोप है कि देवस्थान विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने स्वयं फोन कर उन्हें जयपुर आने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद न तो उन्हें तीर्थ यात्रा करवाई गई और न ही किसी प्रकार की बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराई गई।

अलवर शहर के श्योलाल पूरा मोहल्ला निवासी किशोरी लाल, उनकी पत्नी रेवती और पड़ोसी महिला मिश्री सोमवंशी को 5 दिसंबर को जयपुर से फोन कर बताया गया कि उनका चयन गंगासागर तीर्थ यात्रा के लिए हो चुका है और 9 दिसंबर को जयपुर रेलवे स्टेशन पहुंचना है। निर्देशानुसार तीनों वृद्ध यात्री 9 दिसंबर को सुबह 11 बजे जयपुर पहुंचे, जहां उनसे फॉर्म भरवाए गए और घंटों इंतजार कराया गया।

करीब छह घंटे बाद शाम 5 बजे उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि ट्रेन की सीटें भर चुकी हैं और भविष्य में दोबारा बुलाया जाएगा। पीड़ितों का कहना है कि अलवर के आवेदन पहले लिए गए थे, इसके बावजूद पिलानी और झुंझुनू के यात्रियों को प्राथमिकता दी गई।

किशोरी लाल ने बताया कि वे मजदूरी कर जीवन यापन करते हैं। निशुल्क तीर्थ यात्रा के भरोसे वे किराया खर्च कर जयपुर पहुंचे, जहां प्रति व्यक्ति करीब दो हजार रुपये खर्च हो गए। न यात्रा मिली, न भोजन-पानी की कोई व्यवस्था की गई। देर रात निराश होकर वे अलवर लौट आए।

पीड़ितों ने स्थानीय अधिकारियों को भी पूरे मामले से अवगत कराया, लेकिन कोई समाधान नहीं मिला। मजबूर होकर उन्होंने मीडिया के सामने अपनी पीड़ा रखी।

यह मामला सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और उनके क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जब योजनाओं का उद्देश्य बुजुर्गों को सम्मान और सुविधा देना है, तो फिर इस तरह की लापरवाही क्यों? देवस्थान विभाग की कार्यप्रणाली ने न केवल योजना की मंशा पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि सरकार के दावों की भी पोल खोल दी है।

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